इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं जबलपुर की गौरव गाथाएं

इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं जबलपुर की गौरव गाथाएं

ईसा पूर्व 322 में चन्द्रगुप्त मौर्य ने जब मगध के राजा नंद का विनाश किया था, तब उनका राज्य नर्मदा के तट तक फैला था। जबलपुर नगरी कभी गढ़ा गोंडवाना, तो कभी त्रिपुरी के नाम से विख्यात रही। यहां कई कलचुरि राजा हुए, जिन्होंने हिमालय से लेकर सागर के तट तक समस्त राज सत्ताओं को त्रिपुरी के अधीन कर दिया था। इनका था जबलपुर से संबंध, मिलते हैं शिलालेख : ईसा पूर्व 273 में सम्राट अशोक ने बहोरीबंद के निकट रूपनाथ में अपना 256 वां पड़ाव डाला था। यहां लगे एक शिलालेख में सम्राट अशोक ने लिखवाया था कि परिम से नीचे से नीचा व्यक्ति भी ऊंचा स्थान पा सकता है। ईसा पूर्व 94 में जब मौर्य वंश का अवसान हुआ, तब उनसे जो जनपद अलग हुए उनमें त्रिपुरी का भी उल्लेख है।

त्रिपुरी सत्ता का विस्तार

1041 में गांगेयदेव का लड़का कर्णदेव गद्दी पर बैठा, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के तीन हिस्सों तक अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। कर्णदेव ने दक्षिण के चोल, पांड्य, मालावार के मुरलो, कोयम्बटूर के कुंग, कांगड़े के कीर, पंजाब के हूण, मालवा के भोज जैसे अनेक राजाओं को त्रिपुरी की सत्ता के अधीन किया।

आज भी मौजूद हैं इस वंश की निशानियां

तेवर, हथियागढ़, भेड़ाघाट में चौसठयोगिनी मंदिर एवं वरेश्वर शिव की प्रतिमा, अमरकंटक का केशवनारायण मंदिर, गोपालपुर के मंदिर, कटनी बिलहरी, रूपनाथ, कारीतलाई, नोहटा, काशी का कर्णमेरू मंदिर जैसे स्थानों पर जितने भी प्राचीन मंदिर व मूर्तियां हैं, वे सभी कलचुरिकाल की देन है

रावण को बनाया था बंधक

कलचुरिवंश अपने को सहस्त्रार्जुन का वंशज बताता है, जिन्होंने लंकापति रावण को बांधकर रखा था। सन 875 में कोकल्यदेव राजा हुए। राजा लक्ष्मणराज का शासन 950 में रहा, जिन्होंने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार पूर्व से लेकर पश्चिम के समुद्र तट तक किया। गांगेयदेव ने राज्य की सीमाओं को दक्षिण में कर्नाटक और उत्तर भारत तक बढ़ाया। गांगेयदेव की वीरता नेपाल तक जा पहुंची थी। 1030 में अरबी विद्वान अलबरूनी ने गांगेयदेव की वीरता का बखान अपनी पुस्तक में किया था।