नोटिस जारी करने की होड़ में लगा है आयकर विभाग

नोटिस जारी करने की होड़ में लगा है आयकर विभाग

इंदौर। आजकल आयकर विभाग किसी भी तरह से नोटिस इश्यू करने की होड़ में लगा हुआ है। आजकल देखने में आ रहा है कि 90 फीसदी से ज्यादा मामलों में नोटिस लिमिटेशन पीरियड समाप्त होने से एक या दो दिन पहले जारी किया जाता है। विभाग की इस तरह की प्रक्रिया दर्शाती है कि विभाग के पास आयकर से संबंधित मामलों के मूल्यांकन की निरंतरता नहीं है। ये बात मुंबई से आए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट फिरोज बी. अधियारूजिना ने इंदौर सीए शाखा द्वारा कॉन्स्टिट्यूशनल रेमेडीज इन इनकम टैक्स विषय पर आयोजित सेमिनार में कही। सेमिनार में इंदौर सीए शाखा के चेयरमैन सीए अभय शर्मा, सीए यश खंडेलवाल और सीए श्वेता अजमेरा सहित बड़ी संख्या में सीए मौजूद थे। टैक्स प्रक्रिया के लिए निरंतरता जरूरी एडवोकेट फिरोज ने कहा कि टैक्सेशन प्रोसीडिंग्स में सर्टेनिटी होना जरूरी है। उन्होंने बताया कि आयकर की धारा 147/148 के अनुसार 4 और 6 वर्षों के अंदर किसी भी केस को री-ओपन किया का सकता है। उन्होंने बताया कि नोटबंदी के बाद पैनी स्टॉक के हजारों केस री-ओपन हुए हैं। इनमें कहा गया है कि एक्स कंपनी के यहां इनकम टैक्स की सर्च में आपके फेक ट्रांजेक्शन के दस्तावेज मिले हैं, इस वजह से केस को री-ओपन किया है।

सीए को कॉन्स्टिट्यूशन एक्ट की जानकारी भी जरूरी

एडवोकेट फिरोज ने सेमिनार में उपस्थित सीए से कहा कि सीए इनकम टैक्स एक्ट के एक्सपर्ट होते हैं, लेकिन कई बार देखने में आया है कि करदाता कोर्ट में अपील कर ऐसे मामलों में राहत पा लेते हैं, इसलिए एक सीए को आयकर कानून के साथ कॉन्स्टिट्यूशन की भी जानकारी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक किसी भी केस को री-ओपन करने के लिए प्रॉपर रीजन टू बिलीव टैक्स इवेजन होना चाहिए। यह रीजन टू बिलीव एसेसिंग आॅफिसर द्वारा अनुसंधान किया गया होना चाहिए।