‘एक थप्पड़ दिखाने के लिए खाने पड़े 7 जोरदार थप्पड़’

‘एक थप्पड़ दिखाने के लिए खाने पड़े 7 जोरदार थप्पड़’

भोपाल | मेरा को-स्टार पावेल इस बात से घबराया हुआ था, कि उसे मुझे जोर से थप्पड़ मारना है। वो इतना ज्यादा डरा हुआ और बैचेन था कि उसे मानसिक तौर पर इस शॉट के लिए तैयार होने में दो दिन लग गए। मुझे इस शॉट को परफेक्ट करने में काफी रीटेक लग गए। फिल्म में केवल एक ही थप्पड़ दिखाया जाएगा, लेकिन इस शॉट को पूरा करने में मुझे 7 थप्पड़ यानि 7 रीटेक लगे। यह कहना था एक्ट्रेस तापसी पन्नू का जिन्होंने आईएम भोपाल के साथ खास बातचीत में फिल्म से जुड़े खास अनुभव शेयर किए। उन्होंने बताया कि यह काफी महत्वपूर्ण शॉट था और हम इसे हल्के में नहीं ले सकते थे। डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने कहा था कि ये शॉट बिल्कुल परफेक्ट होना चाहिए, क्योंकि आॅडियन्स जब 60 एमएम के पर्दे पर इसे देखेगी, तो ये काफी प्रभावशाली लगेगा। कभी वो मेरे गले पर थप्पड़ मार देता था, तो कभी कान पर मार दे रहा था। मैंने उसे कहा था कि कुछ मत सोचो, एक कस के थप्पड़ मारो और ये मसला खत्म करो।

एक्टर होने के नाते कैरेक्टर दिमाग में रह जाते है

मैं ज्यादा किताबें पढ़ती नहीं हूं क्योंकि मैंने बचपन में सारे टाइम टेक्स्ट बुक ही पढ़ी हैं। मैं साइंस स्टूडेंट रहीं हूं, तो सारा समय पढ़ने में निकल जाता था और जैसे कॉलेज में आई तो सारा समय स्क्रिप्ट पढ़ने में निकल गया। मैंने बुक रीडिंग हैबिट डेवलप नहीं की। जब मैं अलग-अलग जॉनर की पिक्चर्स करती हूं, तब मेरा मानसिक संतुलन हिल जाता है। ये कह लीजिए एक तरह कीमत है एक्टर होने पर अदा करनी पड़ती है। जब एक ही किरदार को 40 दिन तक एक ही किरदार को 12-12 घंटे जी रहे हैं तो दिमाग पर कैरेक्टर बैठा रहता है। उस चीज से बाहर से आने बहुत समय लगता है और यह सब मेरी फिल्म ‘पिंक’ के बाद से शुरू हो गया था। इन सब से निकलने के लिए मैं हॉलिडे पर चली जाती हूं और किसी भी तरह से फिल्म के बारे में बात नहीं करती। एक टाइम पर एक ही पिक्चर करती हूं, ताकि ज्यादा दिमाग खराब न हो।

क्या है फिल्म थप्पड़ में

  • फिल्म थप्पड़ में एक महिला के सेल्फ रिस्पेक्ट को दिखाया गया है। चाहे बड़े घरेलू हिंसा की जाए या छोटे तौर पर, कभी-भी महिला को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
  • इसके ट्रेलर की बात करें तो महिला के स्वाभिमान को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
  • दिखाया है कि कैसे एक नारी शादी के बाद अपना सब कुछ छोड़ सपने छोड़कर परिवार की ही सेवा करती रहती है।
  • पहली बार तापसी का पति उसे थप्पड़ मारता है तो तापसी में अपनी स्वाभिमान की भूख जागने लगती है।

फिल्म इंडस्ट्री को फाइनेंशियल हेल्प के लिए प्लेटफार्म तैयार करने की जरुरत

‘कोई फिल्म आॅस्कर को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती। कई बार कहा जाता रहा है कि कोई दूसरी फिल्म भेजनी चाहिए थी। मैं एक फेसबुक पोस्ट पर दो लोगों के कमेंट्स पढ़ रहा था कि क्यों कोरिया की फिल्म ‘पैरासाइट’ को आॅस्कर मिला है। उनके कमेंट्स पढ़ने पर पता चला कि उनकी सरकार फिल्म इंडस्ट्री को बहुत पेट्रोनाइज करती है, दूसरी कंट्रीज में ऐसा नहीं होता। भारत में फिल्म इंडस्ट्री को सरकार के आशीर्वाद की जरुरत है। फिल्म के प्रमोशन के लिए भोपाल पहुंचे निर्देशक अनुभव सिन्हा ने यह बात कही। उन्होंने आगे कहा कि ‘इसमें फिल्म इंडस्ट्री की भी गलती है, कभी उसको सीरियसली लिया ही नहीं। इंडिया की फिल्म इंडस्ट्री है दुनिया में जिसको कोई फाइनेंशियल सपोर्ट नहीं करता। आपको कोई फिल्म बनानी है तो किसी बैंक से लोन नहीं ले सकते उसमें खुद का पैसा ही लगाना पढ़ता है। सच कहूं तापसी पन्नू मेरी फेवरेट है। फिल्म थप्पड़ के कांसेप्ट की बात करें, तो एक वन लाइन आइडिया यही था कि एक अच्छा हस्बैंड लाइफ में अपनी वाइफ को थप्पड़ मारता है। इस थप्पड़ से वह डील नहीं कर पाती। शादी के तीन साल बाद उसमें थप्पड़ मारता है। हस्बैंड कोई एब्यूसिव आदमी नहीं है पर क्या वो थप्पड़ जायज है यह सवाल उठता है। ‘एक ऐसा प्लेटफॉर्म स्टेट और सेंट्रल गवर्नमेंट को तैयार करने की जरुरत है जिसमें फिल्म इंडस्ट्री को फाइनेंशियल हेल्प मिल सके।’ हाल ही में हुए फिल्फेयर अवॉर्ड कंट्रोवर्सी जिसमें गीतकार मनोज मुंताशिर को बेस्ट लिरिसिस्ट ने हमेशा के लिए बॉयकॉट कर दिया है। इस पर निर्देशक अनुभव सिन्हा ने कहा कि इन अवॉर्ड्स को सीरियसली लेने की जरुरत नहीं है।

तापसी पन्नू मेरी फेवरेट एक्ट्रेस

अक्सर मुझसे पूछा जा रहा मेरी फिल्म थप्पड़ में सिर्फ तापसी पन्नू ही क्यों ली गई है। मुझे आज भी याद है कि जब मैंने पिछली फिल्म मुल्क कम्पलीट कर ली थी, तब मैंने फिल्म थप्पड़का एक बेसिक आइडिया सुनाया था और तापसी इसके लिए तैयार थीं।

फिल्म में हर उम्र और वर्ग की महिला के मन को टटोला गया, यही इसकी खूबसूरती

तापसी पन्नू अभिनीत मूवी थप्पड़ का स्पेशल प्रीमियर शो गुलमोहर कॉलोनी के एक मॉल में गुरुवार को हुआ। यह पहला मौका था जबकि शहर में फिल्म प्रीमियर आम लोगों के लिए भी किया गया। फिल्म 28 फरवरी को रिलीज होगी। इस मौके पर शहर के कॉलेजों की प्रोफेसर्स, स्कूल और कॉलेज स्टूडेंट्स सहित घरेलु हिंसा के खिलाफ काम करने वाले एनजीओ और निर्देशक अभिनीत सिन्हा, सुधीर मिश्रा मौजूद रहे।

सभी को विचार करने का मौका मिलेगा....

मुझे लगता है कि फिल्म में जो एक औरत का रूटीन दिखाया गया, उसे ज्यादा लंबा रखा गया और ऐसा करना ठीक भी लगा क्योंकि इससे महसूस हो पाया कि एक औरत किस तरह घड़ी की सुईयों के हिसाब से चले जा रही है, यह मानकर कि वो परिवार उसका है और उसके काम भी कद्र है। करियर ओरियंटेड लड़की घर की जिम्मेदारी खुशी-खुशी उठा रही है क्योंकि यही उसका इंवेस्टमेंट हैं लेकिन घरवालों ने इसे गलत समझ लिया। -डॉ. सीमा रायजादा, प्रेसीडेंट क्लब लिटराटी

पुरुष मूवी थप्पड़ को जरूर देखने जाएं....

फिल्म कंटेपरेरी इश्यू पर है और यह दिल को छूती है। पुरूषों को यह मूवी जरूर देखना चाहिए। इसे देखते हुए सन्न से रह जाते हैं कि यह सब कुछ महिला के साथ होता है और वो खामोशी से सब सहती जाती है, क्योंकि उसकी परवरिश इस तरह की जाती है कि उसे पति की डांट-फटकार और मार को छोटी-छोटी बात मान लिया जाता है। अमृता (तापसी) बिना शोर-शराबे के अपनी बात बहुत सही ढंग से सभी को जता देती है। -प्रो. प्रज्ञा रावत, पोएट