Kumbh 2019: कुंभ स्‍नान के बहाने प्रयागराज की इन जगहों का भी करें भ्रमण, यादें रहेंगी ताजा

Kumbh 2019: कुंभ स्‍नान के बहाने प्रयागराज की इन जगहों का भी करें भ्रमण, यादें रहेंगी ताजा
Kumbh 2019: कुंभ स्‍नान के बहाने प्रयागराज की इन जगहों का भी करें भ्रमण, यादें रहेंगी ताजा
Kumbh 2019: कुंभ स्‍नान के बहाने प्रयागराज की इन जगहों का भी करें भ्रमण, यादें रहेंगी ताजा
Kumbh 2019: कुंभ स्‍नान के बहाने प्रयागराज की इन जगहों का भी करें भ्रमण, यादें रहेंगी ताजा
Kumbh 2019: कुंभ स्‍नान के बहाने प्रयागराज की इन जगहों का भी करें भ्रमण, यादें रहेंगी ताजा

कुंभ 2019 का आगाज प्रयागराज में बस कुछ ही दिनों में होने वाला है। तीर्थराज के रूप में जाना जानेवाला प्रयागराज दुनिया का एकमात्र ऐसा स्‍थान है, जहां पर तीन-तीन नदियां यानी गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्‍वती मिलती है और यही से अन्‍य नदियों का अस्तित्‍व समाप्‍त होकर आगे एकमात्र गंगा का महत्‍व बाकी रह जाता है। ऋषियों-देवताओं ने जिस त्रिवेणी संगम में स्‍नान कर अपने आपको धन्‍य माना है, उस प्रयागराज में 15 जनवरी से चार मार्च 2019 तक कुंभ होने जा रहा है। ऐसे में अगर आप भी कुंभ आने का प्‍लान बना रहे हैं तो यह खबर आपके काम की है। कुंभ स्‍नान के बाद प्रयागराज में आप इन जगहों पर घूमने जा सकते हैं, जिससे आपका ये सफर हमेशा के लिए यादगार बन सकेगा। तो आइए जानते हैं वो जगह, जहां आप घूम सकते हैं:-

संकटमोचन हनुमान मंदिर-

प्रयागराज स्थित दारागंज मोहल्ले में गंगा जी के किनारे संकटमोचन हनुमान मंदिर है। यह कहा जाता है कि संत समर्थ गुरु रामदास जी ने यहां भगवान हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की थी। शिव-पार्वती, गणेश, भैरव, दुर्गा, काली एवं नवग्रह की मूर्तियां भी मंदिर परिसर में स्थापित हैं। निकट में श्री राम जानकी मंदिर एवं हरित माधव मंदिर हैं।

भारद्वाज आश्रम-

मुनि भारद्वाज से सम्बद्ध यह एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। मुनि भारद्वाज के समय यह एक प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र था। कहा जाता है कि भगवान राम अपने वनवास पर चित्रकूट जाते समय सीता जी एवं लक्ष्मण जी के साथ इस स्थान पर आये थे। वर्तमान में वहां भारद्वाजेश्वर महादेव मुनि भारद्वाज, तीर्थराज प्रयाग और देवी काली इत्यादि के मंदिर हैं। निकट ही सुन्दर भारद्वाज पार्क एवं आनन्द भवन है।

शंकर विमान मण्डपम-

दक्षिण भारतीय शैली का यह मंदिर चार स्तम्भों पर निर्मित है। जिसमें कुमारिल भट्ट, जगतगुरु आदि शंकराचार्य, कामाक्षी देवी (चारों ओर 51 शक्ति की मूर्तियां के साथ), तिरूपति बाला जी (चारों ओर 108 विष्णु भगवान) और योगशास्त्र सहस्त्रयोग लिंग (108 शिवलिंग) स्थापित है।

श्री अखिलेश्वर महादेव-

चिन्मय मिशन के अधीन प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) में रसूलाबाद घाट के निकट 500 वर्ग फिट के लगभग एक क्षेत्र में श्री अखिलेश्वर महादेव संकुल फैला हुआ है। आधारशिला 30 अक्टूबर, 2004 को चिन्मय मिशन के परमपूज्य स्वामी तेजोमयनन्दजी एवं पूज्य स्वामी सुबोधानन्द जी के द्वारा रखी गयी थी। आधार तल से ऊपर राजस्थान से गुलाबी पत्थर मंगा कर कटाई की जा रही है और श्री अखिलेश्वर महादेव ध्यान मण्डपम को आकार प्रदान करने के लिये लगाये जा रहे हैं। आधार पर लगभग 300 व्यक्तिगण की क्षमता वाली एक सत्संग भवन हेतु निर्मित किया गया है और श्री अखिलेश्वर महादेव के लिये समस्त आवश्यक सेवायें उपलब्ध है।

दशाश्वमेघ मंदिर-

यह दारागंज में गंगा नदी के किनारे स्थित शहर के तटीय क्षेत्रों में से एक है। कहा जाता है कि भगवान बह्मा जी ने यहां अश्वमेघ यज्ञ किया था। दशाश्वमेघेश्वर महादेव-शिवलिंग, नंदी, शेषनाग की मूर्तियां एवं एक बड़ा त्रिशूल मंदिर में स्थापित किये गये हैं। चैतन्य महाप्रभु की स्मृति में उनके पदचिन्हों की बिम्ब धारित करती हुई एक संगमरमर की पट्टी भी यहां लगी हुई है। इस मंदिर के निकट में ही देवी अन्नपूर्णा भगवान हनुमान एवं भगवान गणेश के मंदिर हैं।

तक्षकेश्वर नाथ मंदिर-

तक्षकेश्वर भगवान शंकर का मंदिर है जो प्रयागराज की दक्षिण दिशा में स्थित दरियाबाद मोहल्ले में यमुना तट पर स्थित है। इससे थोड़ी दूर पर यमुना में तक्षकेश्वर कुंड है। जन श्रुति यह है कि तक्षक नाग ने भगवान कृष्ण द्वारा मथुरा से भगाये जाने के पश्चात् यहीं शरण ली थी।

श्री वेणी माधव-

पद्मपुराण में वर्णन के अनुसार लोकमान्यता है कि सृष्टीकर्ता ब्रह्मा जी प्रयागराज की धरती पर जब यज्ञ कर रहे थे तब उन्होंने प्रयागराज की सुरक्षा हेतु भगवान विष्णु से प्रार्थना कर उनके बारह स्वरूपों की स्थापना करवाई थी। प्रयागराज के बारह माधव मंदिरों में सर्वप्रसिद्ध श्री वेणी माधव जी का मंदिर दारागंज के निराला मार्ग पर स्थित है। मन्दिर में शालिग्राम शिला निर्मित श्याम रंग की माधव प्रतिमा गर्भगृह में स्थापित है। श्री वेणी माधव को ही प्रयागराज का प्रधान देवता भी माना जाता है। यहाँ वर्ष भर श्रधालुओं का ताँता लगा रहता है। श्री वेणी माधव के दर्शन के बिना प्रयागराज की यात्रा एवं यहाँ होने वाली पंचकोसी परिक्रमा को पूर्ण नहीं कहा जा सकता। चैतन्य महाप्रभु जी स्वयं अपने प्रयागराज प्रवास के समय यहाँ रह कर भजन-कीर्तन किया करते थे।

विक्टोरिया स्मारक-

रानी विक्टोरिया को समर्पित इटालियन चूना पत्थर से निर्मित यह स्मारक स्थापत्य कला का एक जीवंत उदाहरण है। इसे 24 मार्च, 1906 को जेम्स डिगेस ला टच के द्वारा 1906 में खोला गया था। त्रिकोणात्मक रचना में कभी रानी विक्टोरिया की बड़ी मूर्ति लगी हुई थी जो वर्तमान समय में वहाँ नहीं हैं।

गंगा गैलरी (राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी)-

5, लाजपत राय मार्ग, नया कटरा स्थित यह गैलरी गंगा नदी की धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक-आर्थिक एवं वैज्ञानिक पक्ष को प्रकाशित करने के लिये एक वैज्ञानिक दृष्टि का प्रयोग करती है।

प्रयाग संगीत समिति-

यह वर्ष 1926 में भारतीय जन मानस में भारतीय शास्त्रीय संगीत पढ़ाने और लोकप्रिय बनाने की सोंच के साथ स्थापित किया गया था। यह संस्था भारतीय समितियां अधिनियम संख्या (गत, वर्ष 1860) के अधीन पंजीकृत है। समिति का मूल उद्देश्य गायन, वादन एवं नृत्य को सम्मिलित करते हुए संगीत कला की प्रतिष्ठा को सदैव पुनर्जीवित रखनातथा भारत व विदेशों में भी इस कला में व्यवस्थित प्रशिक्षण प्रदान करना है, इसके अलावा इसे अधिकतम लोगों तक पहुंचाना है। इस बिन्दु को दृष्टिगत रखकर समिति श्रद्धापूर्वक आज तक महत्वपूर्ण कार्य करने में संलिप्त है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय-

इलाहाबाद विश्वविद्यालय को एक शताब्दी से अधिक समय तक भारत के विश्वविद्यालयों के मध्य एक सम्मानित स्थान प्राप्त है। 23 सितम्बर, 1887 को स्थापित यह कलकत्ता, बाम्बे और मद्रास विश्वविद्यालय के पश्चात् चौथा पुराना विश्वविद्यालय है। प्रयागराज में एक बड़े केन्द्रीय कालेज की स्थापना एवं इसे एक विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने का श्रेय सर विलियम म्योर को जाता है जो यूनाइटेड प्राविन्स के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप म्योर सेन्ट्रल कालेज की आधारशिला 9 दिसम्बर, 1873 को वायसराय लार्ड नार्थब्रुक के द्वारा रखी गयी थी। विजय नगरम हाल, सीनेट हाल (दरबार हाल), एस.एस.एल. हास्टल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बड़ी इमारतें हैं।

पब्लिक लाइब्रेरी-

शहर की सबसे पुरानी लाइब्रेरी चन्द्रशेखर आजाद पार्क परिसर के भीतर स्थित है। इसमें ऐतिहासिक पुस्तकों, पाण्डुलिपियों एवं पत्रिकाओं का बृहद संग्रह है। इस लाइब्रेरी को चैथम लाइन्स क्षेत्र में 1864 में स्थापित किया गया था, वर्तमान भवन का वर्ष 1878 में निर्माण के पश्चात् लाइब्रेरी को यहां स्थानान्तरित किया गया था। इस दर्शनीय भवन का एक अन्य गरिमामयी अध्याय भी है। यहां राज्य की प्रथम विधान सभा ने अपनी प्रथम बैठक इसी भवन में 8 जनवरी, 1887 को किया था। लार्ड थार्नहिल एवं माइन की स्मृति में निर्मित यह भवन गोथिक आर्कीटेक्चर का एक सुन्दर उदाहरण है।