बार-बेंच एक ही नाव पर सवार, इसलिए चप्पू अलग-अलग न चलाएं

बार-बेंच एक ही नाव पर सवार, इसलिए चप्पू अलग-अलग न चलाएं

जबलपुर। मध्यप्रदेश स्टेट बार काउंसिल के गोल्डन जुबली समारोह के दूसरे दिन रविवार को आयोजित व्याख्यान समारोह में हाईकोर्ट जस्टिस सुजय पॉल ने कहा कि बार और बेंच के संबंध का न्यायदान में अहम् योगदान है। यदि न्यायालय की प्रतिष्ठा धूमिल होती है तो अभिभाषक की भी नहीं बच रही है। अनेक उदाहरण, लतीफों और शेर एवं दृष्टांत के साथ अपनी बात रखते हुए जस्टिस सुजय पॉल ने कहा कि बार और बेंच दोनों ही मिल कर एक अकादमिक माहौल तैयार करें ताकि पहले ही दिन पता चल सके कि दर्द कहां पर है। उन्होंने कहा कोर्ट की सर्वाधिक आलोचना लंबित प्रकरणों को लेकर हो रही है। इसलिए न्यायाधीश कम हैं, अथवा संसाधनों की कमी का विलाप करने की बजाय जो उपलब्ध है उसी से न्यायदान कैसे बढ़े इस पर फोकस होना चाहिए। जस्टिस सुजय पॉल बार और बेंच के संबंध-समन्वय के महत्व विषय पर बोल रहे थे। जिसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि बार और बेंच एक ही नाव पर सवार हैं, जिनका उद्देश्य न्याय की देवी तक पहुंचना है। इसलिए दोनों का चप्पू अलग-अलग दिशा में नहीं चलना चाहिए। लोक अभियोजक पर रखी बात इसके पहले जस्टिस अतुल श्रीधरन ने लोक अभियोजक की जागरुकता का न्यायदान में महत्व विषय पर बोलते हुए अपनी बात रखी। जस्टिस श्रीधरन ने कहा यदि लोक अभियोजक जागरुक है तो अपराधी बच नहीं सकता वहीं न्यायालय के लिए भी न्यायदान आसान होता है। जस्टिस श्रीधरन ने बार काउंसिल, दस्तावेज,सबूतों, भारतीय दंड विधान संहिता, चार्जशीट, सबूतों के वैज्ञानिक परीक्षण फोरेंंसिक जांच, वैज्ञानिक सबूत और परंपरागत तरीके से जांच, पुलिस की जांच तरीका, जांच का वैज्ञानिक तरीका कैसा हो इस पर अपने विचार व्यक्त किए। मानस भवन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मंच पर बार काउंसिल आॅफ इंडिया के सुनील गुप्ता,स्टेट बार काउंसिल चेयरमेन शिवेंद्र उपाध्याय,दिनेश नारायण पाठक, प्रबल प्रताप सिंह आदि भी मंचासीन रहे। संचालन जितेंद्र शर्मा ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विधि और न्यायजगत के पदाधिकारी,सदस्य, विधि छात्र- छात्राएं भी मौजूद रहे।