हंगामा किया तो छिन सकता है वोटिंग करने का अधिकार

हंगामा किया तो छिन सकता है वोटिंग करने का अधिकार

नई दिल्ली। राज्यसभा में गतिरोध एक बड़ी समस्या है और संख्याबल में लोकसभा के मुकाबले ज्यादा मजबूत विपक्षी सांसद आए दिन उच्च सदन में हंगामा करते दिख जाते हैं। अब राज्यसभा में हंगामा करना माननीयों को महंगा पड़ सकता है। उच्च सदन की कमेटी ने ऐसी सिफारिशें की हैं, जिनसे हंगामा करने पर वोटिंग का अधिकार छीना जा सकता है। सदन की जनरल पर्पज कमेटी ने 124 नए नियमों का लागू करने के साथ ही 77 नियमों में संशोधन का प्रस्ताव दिया है। अब यह कमेटी नियमों से जुड़ी कमेटी को अपने प्रस्ताव सौंपेगी।

23 दलों के सामने रखा

सभापति वेंकैया नायडू ने कमेटी की अध्यक्षता की, जिसमें 23 दलों के नेता शामिल हुए थे। सभापति की ओर से मई 2018 में ही नियमों की समीक्षा के लिए एक कमेटी का गठन किया गया था, जिसमें राज्यसभा के पूर्व महासचिव विवेक अग्निहोत्री और कानून मंत्रालय के पूर्व एडिशनल सेक्रेटरी दिनेश भारद्वाज शामिल थे। मप्र के राज्य सभा सांसद राजमणि पटेल (कांग्रेस) और संपतिया उइके (भाजपा) से इस प्रस्ताव के बारे में उनकी राय मांगी गई तो उन्होंने ऐसे किसी प्रस्ताव की जानकारी से अनभिज्ञता जताई।

कमेटी ने दिए सुझाव

* नए नियमों में हंगामा करने वाले सांसद से वोटिंग अधिकार छीनने और उसे गैरमौजूद की श्रेणी में लागू का प्रस्ताव भी शामिल है।

* नए नियम अगर लागू होते हैं तो लोकसभा की तरह वेल में आकर हंगामा करने वाले सांसद सदन की कार्यवाही से निलंबित हो सकते हैं।

* सांसदों को 5 दिन के लिए सदन की कार्यवाही से बाहर रहना पड़ सकता है।

प्रस्ताव इसलिए है महत्वपूर्ण

* कमेटी ने करीब 51 बैठकों के बाद नए नियमों का प्रस्ताव दिया है।

* राज्यसभा के नियमों को लेकर बीते 5 दशक में यह सबसे बड़ी समीक्षा मानी जा रही है।

* इससे पहले जनरल पर्पज कमेटी 13 रिपोर्ट दे चुकी है, जिनमें से कई सुझावों को लागू भी किया गया है।

क्या है रिकॉर्ड?

* पिछले कुछ सालों के बजट सत्रों से तुलना की जाए तो आमतौर पर इस सत्र में बजट पर चर्चा के लिए निर्धारित घंटों के करीब 20% या 33 घंटे बहस होती है।

* आंकड़ों के मुताबिक 2010 का शीतकालीन सत्र प्रोडक्टिविटी के लिहाज से सबसे खराब सत्र रहा था।

* इसके बाद 2013 और 2016 के संसद सत्रों का नंबर आता है।

* 2010- 2014 के बीच संसद के 900 घंटे बर्बाद हुए।

कहां होता है पैसा खर्च

* सांसदों के वेतन के रूप में

* सत्र दौरान सांसदों को मिलने वाले भत्तों के रूप में

* संसद सचिवालय का खर्च

* सत्र के दौरान सांसदों की सुविधाओं पर खर्च के रूप में

टैक्स के रूप में जाता है पैसा

संसद की कार्यवाही के लिए जो इतने पैसे खर्च किए जाते हैं, वो हमारी और आपकी कमाई से जाता है। ये वही धन है, जो हमसे टैक्स के रूप में वसूला जाता है।