कठिन इंदौर;चार विधायक, फिर भी 94 हजार से पीछे रही कांग्रेस

कठिन इंदौर;चार विधायक, फिर भी 94 हजार से पीछे रही कांग्रेस

भोपाल। लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस इस बार उन सीटों पर फोकस करना चाहती है जिन पर भाजपा 30 से 35 सालों से लगातार जीतते आ रही है। पार्टी इन सीटों पर अपने ऐसे नेताओं को उतारना चाहती है जो जाने-पहचाने हों। छिंदवाड़ा में शनिवार को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि ‘पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपनी मर्जी से संसदीय क्षेत्र पसंद करेंगे लेकिन उनका सोचना है कि वे 2-3 कठिन सीटों में से किसी एक पर चुनाव लड़ें।’ ऐसी सीटों में राजधानी भोपाल और इंदौर शामिल हैं। इन दोनों सीटों की तुलना की जाए तो कांग्रेस की राह इंदौर में ज्यादा कठिन है। तीन महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां भाजपा से 93996 वोट ज्यादा मिले। इसकी अपेक्षा भोपाल संसदीय क्षेत्र की सीटों पर कांग्रेस को मिले कुल वोटों का योग 5 लाख 94 हजार 75 है। यहां भाजपा 63475 वोटों से आगे रही। भोपाल और इंदौर प्रदेश की दो ऐसी लोकसभा सीट हैं, जिन पर हार-जीत का असर का संदेश पूरे प्रदेश के कार्यकर्ताओं में जाता है। बकौल सहकारिता मंत्री ‘भोपाल संसदीय सीट नहीं जीत पाने के कारण शर्म से सिर झुकता है।’ कांग्रेस के आभार सम्मेलन की तैयारियों के समय वे यह बात पार्टी के मंच से कह चुके हैं।

महाजन के किले को तोड़ना इसलिए माना जा रहा कठिन

इंदौर की निवृत्तमान सांसद सुमित्रा महाजन ने पहला चुनाव 1989 में जीता था। 25 साल बाद यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में वे 4 लाख 66 हजार 901 वोट से विजयी हुर्इं। आठ में से पांच चुनाव में एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती हैं। हालांकि 1998 में वे 49,852 वोट से जीतीं। 2009 में जब उनकी जीत का अंतर महज 11,480 रह गया तो लग रहा था कि ताई का तिलिस्म टूटने वाला है, लेकिन इसके बाद 2014 के चुनाव में चार लाख की रिकॉर्ड जीत ने एक बार फिर उनकी लोकप्रियता का ग्राफ ऊंचाइयों की ओर दिखा। एक बार वे फिर चुनावी समर में उतरने को तैयार हैं।