लुबना सलीम की बेहतरीन एकल अदाकारी ने किया कहानी को जीवंत

लुबना सलीम की बेहतरीन एकल अदाकारी ने किया कहानी को जीवंत

भोपाल।    इफ़्तेख़ार स्मृति राष्ट्रीय नाट्य एवं सम्मान समारोह के पहले दिन रवींद्र भवन में कला समीक्षक विनय उपाध्याय को केएन पणिक्कर स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके बाद अभिनेत्री लुबना सलीम को हबीब तनवीर स्मृति कला साधना सम्मान से सम्मानित किया गया। इस मौके पर रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे, रंगकर्मी देवेंद्र राज अंकुर उपस्थित रहे। ‘गुड़म्बा-जिंदगी की तरह खट्टा मीठा’, इस एकल अभियन से सजे नाटक का पहला मंचन सोमवार को रवींद्र भवन सभागार में हुआ। टेलीविजन जगत की जानी-मानी अदाकारा लुबना सलीम (बा-बहू-बेबी की लीला भाभी) ने अपने बेहतरीन अभिनय से इन नाटक को ऐसी धार दी कि दर्शक अपनी जगह से हिल भी न सके। उनके पिता जावेद सिद्दीकी ने नाटक लिखा और पति सलीम आरिफ ने निर्देशित किया। नाटक का शीर्षक भी रोचक था, और जल्दी ही दर्शकों को इसका मतलब भी प्रस्तुति के दौरान पता चल गया। गुड़म्बा गुड़ में कच्चे आम डालकर पकाए जाते हैं। जब यह बनकर तैयार होता है तो न तो खीर की तरह जमा हुआ होता है और न शरबत की तरह पतला।

गुड़म्बा नाटक का देश में पहला शो हुआ भोपाल में

इसे पीया भी जा सकता है और खाया भी जा सकता है। इसी खट्टी- मीठी चीज को ही गुड़म्बा कहते हैं। नाटक की कहानी कुछ इस तरह है कि मध्यमवर्गीय परिवार की अमीना यानी मीना जिसे प्यार से मीनू भी कहते हैं, ऐसे संस्कारों के बीच पली-बढ़ी जहां झूठ के खिलाफ आवाज उठाने की मनाही है। लड़कियों को हमेशा कुर्बानी देना चाहिए, इसके विपरीत समान माहौल में पली- बढ़ी दीपा निडर है। घर के माहौल का फर्क पड़ा कि एक ही स्कूल और एक ही तालीम हासिल करने के बाद भी दोनों के व्यक्तित्व सहेली होने के बावजूद जुदा थे। अमीना मानती है कि लड़कियों को दबना नहीं बल्कि दबाने के खिलाफ आवाज मुखर करना होगी। अपने परिवार के ताने-बाने को बयां करती हुई कहानी कभी रूलाती को कभी हंसाती है। आखिर में अमीना कहती हैं, जिंदगी गुड़म्बा होना चाहिए, जिसमें खट्टा-मीठा दोनों स्वाद शामिल रहे। इस प्रस्तुति को बेहद सराहा गया क्योंकि अदाकारा ने अपनी संवाद अदायगी और हावभाव से नाटक को सभी दर्शकों की कहानी बना दिया था। यह नाट्य समारोह 27 अप्रैल तक चलेगा।