प्रसन्न हुए पितर देते हैं वंशजों को संचित पुण्य, तर्पण में महिलाएंभी पीछे नहीं

प्रसन्न हुए पितर देते हैं वंशजों को संचित पुण्य, तर्पण में महिलाएंभी पीछे नहीं

जबलपुर ।   शहर में पुरखों को पानी देने व तर्पण का क्रम 14 सितंबर पूर्णिमा को स्नान दान के साथ प्रारंभ हो चुका है। यह पुण्य कार्य 28 सितंबर पितृमोक्ष अमावस्या को संपन्न होगा। इस बीच हर परिवार में अपने दिवंगत माता-पिता या अन्य संबंधियों को पानी देने का क्रम चल रहा है। इसमें महिलाओं की भी भागीदारी है। कहते हैं कि पुरखों को तृप्त करने पितृ लोक से पितर 15 दिन के लिए भाद्र पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक धरती पर आते हैं। इस दौरान उनके वंशज यदि उन्हें विधि-विधापूर्वक पानी देते हैं,तर्पण करते हैं तो वे संतुष्ट होकर अपने लोक जाते हैं और वहां पर अपने संचित पुण्यों को जरूरत पर अपनी संतानों को भेजते हैं,आकस्मिक आई विपदा,संकट जब परिवारों से टलते हैं तो यह पितरों के आशीर्वाद और संचित पुण्य देने के कारण ही संभव होता है। हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना जाता है। इसलिए पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी जाती है। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। पुरखे हमारी निधि हैं और पितर उसके संवाहक। हमारी संस्कृति व परंपरा में पितृपक्ष इसीलिए आया कि हम अपने बाप- दादाओं का स्मरण करते रहें और उनकी जगह खुद को रखकर भविष्य के बारे में सोचें। हमारे पुरखे श्रुति व स्मृति परंपरा के संवाहक थे। भारतीय ज्ञान परंपरा ऐसे ही चलती आई है और वांगमय को समृद्ध करती रही है। ये पितृपक्ष रिश्तों की ऊष्मा और त्रासदी पर विमर्श का भी विषय है। रवीन्द्र नाथ टैगोर की चेतावनी को याद रखना चाहिए उन्होंने लिखा था जो पीढ़ी पुरखों को विस्मृत कर देती है और भविष्य रूग्ण और असहाय हो जाता है।

अंतिम 3 दिन के श्राद्ध

25 सितंबर द्वादशी श्राद्ध में सन्यासी श्राद्ध होंगे। 27 सितंबर चतुर्दशी श्राद्ध में शस्त्राघात मृतक का श्राद्ध किया जाता है और अंतिम दिन 28 सितंबर पितृमोक्ष अमावस्या  अज्ञात तिथि श्राद्ध किया जाता है।

ऐसे किया जाता है तर्पण

तिल मिश्रित जल की 3-3 अंजुलियां भरकर अर्पित की जाती हैं। इसमें तिल,जवा,चावल,सफेद पुष्प व कुशा का उपयोग किया जाता है। सुबह उठकर स्नान के उपरांत यह विधान किया जाता है। श्राद्ध के पहले दिन पवित्र नदियों में जाकर स्नान दान उपरांत पुरखों का आवाहन कर आमंत्रित किया जाता है। अमावस्या को पुन: नदी में जाकर स्नान कर अनुष्ठान पूर्वक पितरों को विदाई भी दी जाती है। प्रतिदिन मनपंसद स्वादिष्ट भोजन बनाकर कन्या, गाय,कुत्ते आदि को भोग दिया जाता है। घी द्वारा हवन किया जाता है।