राज्यपाल विपक्ष की बात सुनें, पर महापौर चुनाव बिल ना रोकें

राज्यपाल विपक्ष की बात सुनें, पर महापौर चुनाव बिल ना रोकें

भोपाल ।   नगरीय निकाय चुनावों से जुड़े दो विधेयकों में से एक महापौर निर्वाचन संबंधी विधेयक को राज्यपाल द्वारा रोक लिए जाने से सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं। इसे लेकर कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा सामने आए हैं। उन्होंने राज्यपाल से आग्रह किया है कि वे राजधर्म का पालन करें, क्योंकि संविधान में राज्यपाल कैबिनेट की अनुशंसा के तहत कार्य करते हैं। नगरीय प्रशासन एवं आवास विभाग ने निकाय चुनाव को लेकर दो अध्यादेश राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजे हैं। इनमें एक पार्षद प्रत्याशी के हलफनामे को लेकर और दूसरा महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से किए जाने संबंधी है। खबरें हैं कि राज्यपाल ने महापौर निर्वाचन संबंधी अधिनियम होल्ड कर लिया है। चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने की मांग को लेकर आल इंडिया मेयर्स काउंसिल ने राज्यपाल को ज्ञापन दिया है। इससे सरकार की चिंता बढ़ गई है। इसी को लेकर तन्खा ने ट्वीट कर राज्यपाल को राजधर्म का पालन करने की याद दिलाई है। उन्होंने लिखा‘स म्माननीय राज्यपाल आप कुशल प्रशासक थे और हैं। संविधान में राज्यपाल कैबिनेट की अनुशंसा को तहत कार्य करते हैं। इसे राजधर्म कहते हैं। विपक्ष की बात सुने, मगर महापौर चुनाव बिल नहीं रोकें। यह गलत परम्परा होगी। जरा सोचिए।’

मंत्री और पीएस कर चुके हैं मुलाकात

महापौर चुनाव बिल मंजूर करने का आग्रह नगरीय विकास मंत्री जयवर्धन सिंह ने राज्यपाल से मुलाकात की है। प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन संजय दुबे और सीएम के पीएस अशोक वर्णवाल के भी मुलाकात करने की जानकारी है।

संसदीय व्यवस्था का पालन होना चाहिए महापौर चुनाव बिल वापस किए जाने का समाचार मिला था। इस पर हमने महामहिम से राजधर्म का पालन करने का आग्रह किया है। वैसे राज्यपाल कोई बिल एक बार रोक सकते हैं। सरकार अगर पुनर्विचार करके फिर राज्यपाल को बिल भेजती है तो फिर दस्तखत करना ही पड़ेगा।

क्या कर सकते हैं राज्यपाल

सवाल उठ रहे हैं कि क्या राज्यपाल ने अधिनियम नामंजूर कर दिया है। इस बारे में शासन की ओर से कोई अधिकृत वयान नहीं आया है। लेकिन, सरकार को भरोसा है कि राज्यपाल कोई परम्परा नहीं तोड़ेंगे। दरअसल, प्रावधान है कि शासन द्वारा भेजे गए अधिनियम को राज्यपाल होल्ड कर सकते हैं, लेकिन सामान्यता अमान्य नहीं करते हैं। राज्यपाल अगर अधिनियम से सहमत नहीं हैं तो कुछ सुझावों के साथ वापस कर सकते हैं। सरकार फिर विचार करेगी और सहमति के लिए भेजेगी।