वनों की सुरक्षा दांव पर, रक्षक जुटे हैं खरीदी और राशनकार्ड बनाने में..!

वनों की सुरक्षा दांव पर, रक्षक जुटे हैं खरीदी और राशनकार्ड बनाने में..!

भोपाल। वन और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए सरकारी नौकरी में आने वाले कर्मचारी- अधिकारी अपना मूल काम छोड़ कर दूसरी जिम्मेदारियों या दूसरे विभागों में दशकों से जमे हैं। बावजूद वन महकमे को फुर्सत नही है कि अपने कर्मचारी- अधिकारियों को वापस बुला ले। दरअसल इलेक्शन ड्यूटी के लिए हर साल विभिन्न विभागों से अमले की डिमांड की जाती है, लेकिन वन विभाग से ऐसी कोई डिमांड करने की जरुरत ही नहीं पड़ती। इसकी वजह यही है कि वन विभाग के प्रदेशभर में करीब 255 कर्मचारी और अधिकारी ऐसे हैं, जो दशकों से चुनाव ड्यूटी के नाम पर ही जिला कलेक्टर कार्यालय से लेकर दूसरे कार्यालयों में अटैच हैं। इन कर्मचारियों ने इलेक्शन ड्यूटी पूरी हो जाने के बाद भी वापस लौटने की कोई कोशिश नहीं की, क्योंकि वनों की रक्षा के दुर्गम और दुष्कर कार्य के मुकाबले जिला कार्यालयों में बाबूगीरी करना कहीं ज्यादा आरामदायक और फायदेमंद होता है।

नहीं है मुख्यालय तक को डेपुटेशन की जानकारी

सूत्रों का दावा है कि वन विभाग से दूसरे विभागों में गए वन कर्मियों की वापसी की पहल नहीं होने का एक बड़ा कारण यही है कि दशकों से दूसरे विभागों में जमे कर्मियों की अद्यतन जानकारी मुख्यालय को दी ही नहीं गई है। सिर्फ विभागीय सेटअप में पदों की सख्यां ही दर्शाई गई होती है। ऐसे में विभागीय आला अधिकारियों तक को नहीं पता कि कितने कर्मचारी चुनाव ड्यूटी या किसी दूसरे कारणों से कहीं और डेपुटेशन पर या अटैच हैं।

वनों की सुरक्षा हो रही प्रभावित

वन विभाग में फील्ड स्टाफ की कमी का मुद्दा वन मंत्री सिंघार के साथ विभागीय अफसरों ने पहली बैठक में ही उठाया था। इस पर वित्त विभाग से अनुमति मिलने पर दैनिक वेतन भोगियों के नियमितीकरण के साथ ही नए पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरु करने का तय किया गया था। हालांकि जीएडी के 3 साल की मियाद के बाद भी दशकों से डेपुटेशन पर जमे रहने वालों की वापसी के बारे में बात तक नहीं की गई।