उमा भारती की राम रोटी यात्रा या यूं कहें कि बीजेपी का टर्निंग पाइंट

उमा भारती की राम रोटी यात्रा या यूं कहें कि बीजेपी का टर्निंग पाइंट

बात 25 नवंबर 2005 की है। जब देश के सबसे ज्यादा अनुशासित राजनैतिक दल बीजेपी ने मप्र में अपनी लीडरशिप बदली। मप्र बीजेपी की खबरें सीएनएन और बीबीसी की हेडलाइन बनने लगीं, पर शिवराज के नेता चुनने से नहीं, बल्कि उसके पीछे शुरू हुई बीजेपी की फायर ब्रांड नेता उमा भारती की बगावत से। उन दिनों आजतक की बतौर संवाददाता मैंने ये घटनाक्रम अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देखे। नवंबर के महीने का अंतिम दौर था। शिवराज को बीजेपी विधायक दल का नेता चुन लिया गया था। बस आधिकारिक तौर पर मुहर लगनी थी, जिसके लिए बैठक भोपाल के बीजेपी आॅफिस में रखी गई। बैठक के पहले उमा भारती रोड के रास्ते भोपाल पहुंचीं। उनके बंगले पर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था। शिवराज सिंह चौहान विधायक दल के नेता बनने के बाद शताब्दी से भोपाल आए। इस दौरान सीएम हाउस, उमा भारती के बंगले, बीजेपी आॅफिस और शिवराज सिंह चौहान के बंगले के जो नजारे थे वो ये तय कर चुके थे कि बीजेपी में बगावत की इबारत लिखी जा चुकी है। बस देखना ये था कि आखिर वो किस शक्ल में सामने आएगी। हुआ वही जिसकी सभी पत्रकार अटकलें लगा रहे थे। बैठक चल रही थी और बाहर कार्यकर्ताओं द्वारा पथराव और कुर्र्सी फेंकने जैसी घटनाओं के बीच अंदर शिवराज विधायक दल के नेता चुने गए। उमा अपने समर्थकों के साथ बैठक से निकल पड़ीं। हालांकि उनके साथ जितनी उम्मीद थी उतने विधायक नहीं आए, लेकिन कम से कम चार विधायक उमा भारती के साथ निकल पड़े। सड़कों पर सैकड़ों कार्यकर्ताओं की भीड़ के बीच वे आगे बढ़ती जा रही थीं। पीछे देश भर का मीडिया, चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक बड़ी-बड़ी ओबी वैन और भीड़ के पीछे भागते कैमरामेन। उमा भारती भोपाल के सबसे व्यस्ततम चौराहे पर पहुंचीं और ऐलान कर दिया कि वो अयोध्या तक की यात्रा निकालेंगी। लगे हाथ यात्रा का नामकरण राम रोटी यात्रा कर डाला। राम रोटी यात्रा के ऐलान के साथ उमा भारती ने पैदल मार्च शुरू कर दिया। भोपाल से रायसेन, सागर , छतरपुर होते हुए बुंदेलखंड के रास्ते ये यात्रा अयोध्या के लिए निकलीं। शिवराज के नेता घोषित होने के बाद बीजेपी का एक गुट जश्न में डूबा शपथ की तैयारियो में लग गया। वहीं एक धड़ा उमा भारती के साथ राम रोटी यात्रा का हिस्सा बन सड़कों की खाक छानने लगा। रोज यात्रा कहां तक पहुंची, उमा भारती ने क्या कहा, बीजेपी ने क्या ब्रीफ किया इन्हीं के साथ दिन और रात बीत रहे थे। पत्रकारों की एक पूरी टोली उमा भारती के साथ चल रही थी। इस दौरान उमा भारती मौके बे मौके बीजेपी नेताओं के बयानो पर रिएक्शन देतीं। कभी कहतीं बीजेपी की चौकड़ी (जिसमें वो वैंकेया नायडू, प्रमोद महाजन, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज को गिना करती थीं) ने बीजेपी को हाईजैक कर लिया है। बीजेपी में सड़कों पर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता की पूछ नहीं, जैसे तमाम आरोप और प्रत्यारोप रोज मीडिया की खबरों का हिस्सा होते थे। बहरहाल बीजेपी की सबसे बड़ी मास लीडर या ये कहें जननेता की यात्रा धीरे-धीरे बढ़ रही थी। यात्रा में सबकुछ खानाबदोशों की तरह ही था। खाना कहीं खाना, रात कहीं बिताना और उस दौरान लगातार चलने से उमा भारती के पैरो में छाले पड़ चुके थे। यात्रा तो मंजिल के करीब बढ़ती जा रही थी, लेकिन साथ चलने वालों की संख्या घटती जा रही थी। इन्हीं घटनाक्रमों के बीच बीजेपी ने अनुशासन की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया। लेकिन उमा भारती को पार्र्टी से ऐसी ही किसी कार्रवाई की उम्मीद भी थी, क्योंकि देश में अपने अनुशासन और संगठन के लिए जाने जानी वाली बीजेपी के लिए उनकी बगावत सबसे बड़ा धक्का थी। उमा भारती का पहले पार्टी से नाराज होकर भरी मीटिंग में मीडिया के सामने आडवाणी को जवाब देना और मीटिंग छोड़कर बाहर आना, फिर भोपाल से राम रोटी यात्रा निकालना , ये सब कहीं न कहीं बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती थी। चुनौती इसलिए क्योंकि उस दौर में बीजेपी को लोकसभा चुनावो में करारी हार मिल चुकी थी। एनडीए के सामने यूपीए नाम का राजनैतिक संगठन खड़ा हो चुका था कांग्रेस 141 सीटें लाकर भी सरकार को लीड कर रही थी। बीजेपी कही ंन कहीं पार्टी मैदानी स्तर पर मजबूती के लिए हाथ पैर मार रही थी। इसी दौरान मप्र में उमा भारती की बगावत, उप्र में कल्याण सिंह का पार्टी छोड़ना और योगी आदित्यनाथ की अलग हिंदू सेना की तैयारी कहीं न कहीं बीजेपी के हिंदुत्व को चुनौती दे रही थी, क्योंकि यही वे चेहरे थे, जिन पर बीजेपी हिंदुत्व का कार्ड खेला करती थी। हिंदुत्व का कार्ड बने ये चेहरे कमजोर पड़ गए और बीजेपी को केवल संगठन के उन सिपाहियों ने उबारा जो कहीं न कहीं संघ की शाखाओं से मंजकर आए थे। वक्त अपनी रμतार से चलता रहा। उमा भारती ने नई पार्टी बना मप्र में विधानसभा चुनाव लड़ा। उनके खास साथी प्रहलाद पटेल तब तक साथ छोड़ चुके थे। इसके बाद शिवराज एकदो नहीं, बल्कि तीन बार प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुए। आज प्रदेश में बीजेपी की सरकार नहीं, लेकिन शिवराज का कद बड़ा हो गया। देश में बीजेपी की कमान अब अटल-आडवाणी का जगह मोदी और शाह के हाथ में है। पितृपुरुष केवल मार्गदर्शक मंडल में हैं और उम भारती आज भी हिमालय की सैर पर, लेकिन कहीं न कहीं मप्र बीजेपी का वो घटनाक्रम पार्टी में परिवर्तन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ था।