जब समुद्र मंथन हुआ, निकले रत्न अनेक, व्यंग्य समुद्र जब मथा गया तो निकला माणिक एक

जब समुद्र मंथन हुआ, निकले रत्न अनेक, व्यंग्य समुद्र जब मथा गया तो निकला माणिक एक

इंदौर। प्रख्यात कवि माणिक वर्मा का मंगलवार सुबह 80 वर्ष की उम्र में इंदौर में निधन हो गया। सुबह परिवार के लोग जब उन्हें जगाने पहुंचे तब पता चला कि वे नहीं रहे। उनके परिवार में एक पुत्र और एक पुत्री है। मूलत: हरदा के निवासी वर्मा कुछ समय से इन्दौर में रह रहे थे। उनके पुत्र राजकुमार वर्मा टीकमगढ़ में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज हैं। कविताओं और अपने व्यंग्य की धार से साहित्य जगत की शान रहे वर्मा तबीयत खराब होने के बाद भी लगातार सक्रिय बने रहे। कुछ समय पहले ही उन्होंने राइटर्स क्लब के मंच पर कविता पाठ किया था। अंतिम संस्कार आज : वर्मा का अंतिम संस्कार बुधवार को सुबह 9 बजे तिलक नगर मुक्तिधाम पर किया जाएगा। अंतिम यात्रा उनके 19, संपत फॉर्म हाउस, सेकंड क्रॉस रोड, अग्रवाल पब्लिक स्कूल के सामने स्थित निवास स्थान से निकलेगी।

स्मृति शेष

व्यंग्य की विचारधारा को जिस शालीनता से माणिक वर्मा ने प्रस्तुत किया, वो उन्हें इस विधा का शीर्षस्थ सुमेरू सुशोभित करती है। व्यंग्य पहले भी मंचों पर था, लेकिन क्लिष्टता से सरलता में प्रवाहित करने का श्रेय सिर्फ माणिकजी को जाता है। उनकी रचनाएं सच, स्वस्थ मानसिकता से पोषित रहती थीं। कठिन से कठिन बात को मर्यादित सीमा रेखा में बांधकर अभिव्यक्त करने वाला कवि माणिक के अलावा मैंने दूसरा नहीं देखा। वे उस श्रेणी की पात्रता रखते थे, जो शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, केपी सक्सेना, सरोज कुमार जैसे व्यंग्यकारों की है। माणिक ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाने के उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। खास बात यह कि शरदजी, परसाईजी ने गद्य में व्यंग्य प्रस्तुत किया, माणिक उसे कविता के रूप में सामने लाए। उन्हें कविता का गुण पिता से विरासत में मिला। पिता प्यारेलाल वर्मा भी प्रसिद्ध कवि थे। एक जमाने में माणिक गजलें पढ़ा करते थे। माणिक के ठहाकों और संदेशों में स्वस्थ व्यंग्य की सूचना होती थी। जब वे मंच पर खडेÞ होते, श्रोता समझ जाते थे, माणिक दा कोई न कोई गंभीर चोट जरूर करेंगे। उनके व्यंग्य की खूबी थी कि चुभन के साथ आनंद। इसलिए उनकी रचनाएं कालजयी हुर्इं। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि अब तक उनकी विधा में कोई उनके समानांतर स्थापित नहीं हुआ। 60 के दशक में प्रदेश से शैल चतुर्वेदी, माणिक वर्मा और मेरा अभ्युदय साथ हुआ। पहले हम आसपास के गांवों, स्थानीय मंचों, मीलों के झांकियों के कवि सम्मेलन में कविताएं पढ़ते थे। साथ-साथ आगे बढ़े। माणिक का पैतृक घर खंडवा के घासपुरा मोहल्ले में हुआ करता था। पिता के साथ हरदा आए। फिर भोपाल और फिर इंदौर में रहे। शुरुआती दौर में शिक्षक की भूमिका में थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि माणिक एक कुशल टेलर भी थे। देश विदेश में मैंने माणिकजी के साथ सैकड़ों बार मंच साझा किए। इत्तेफाक से मंच संचालन मैं किया करता था। जब भी उन्हें कविता पढ़ने बुलाया तो यही पंक्तियां निकलीं- जब समुद्र मंथन किया, निकले रत्न अनेक, व्यंग्य समुद्र जब मथा गया तो निकला माणिक एक...।