लंबी व्यंग्य रचना लिखना और उसे व्यंग्य उपन्यास में बदल देना दोनों अलग बातें है

लंबी व्यंग्य रचना लिखना और उसे व्यंग्य उपन्यास में बदल देना दोनों अलग बातें है

भोपाल ।  एक लंबी व्यंग्य रचना लिखना और उसे व्यंग्य उपन्यास में बदल देना बहुत कुशल लेखकीय कारीगरी की मांग करता है। जब किसी लेखक को व्यंग्य या उपन्यास दोनों की गहरी समझ होती है। जब वह व्यंग्य और उपन्यास दोनों कठिन विधाओं को एक साथ निभा लेता है तब कहीं जाकर ऐसी रचना बनती है जैसी यह ‘तंत्र कथा’ बनी है। यह बात प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने लेखक कुमार सुरेश के हाल ही प्रकाशित उपन्यास ‘तंत्र कथा’ का लोकार्पण करते हुए कहीं। वनमाली सृजन पीठ द्वारा स्वराज भवन में आयोजित एक आत्मीय समारोह में आलोचक मलय जैन और कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने भी कुमार सुरेश के लेखकीय व्यक्तित्व पर चर्चा की। आरंभ में कुमार सुरेश ने उपन्यास ‘तंत्र कथा’ की विषय वस्तु और पृष्ठभूमि खुलासा करते हुए बताया कि यह उपन्यास उन्होंने श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ और ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘नरक यात्रा’ की कड़ी के रूप में लिखने का प्रयास किया है। इस उपन्यास में एक शासकीय कार्यालय और शासकीय अधिकारी के जीवन से जुड़े उन तमाम पहलुओं को व्यंग्य दृष्टि से समाहित करने का प्रयास किया गया है जिसकी जानकारी अक्सर लोगों को नहीं होती है। मुख्य अतिथि डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस उपन्यास ‘तंत्र कथा’ का विषय अभी तक प्रकाशित व्यंग्य उपन्यासों से अलग और अनूठा है। एक सामान्य व्यंग्य रचना लिखना, एक लंबी व्यंग्य रचना लिखना, एक उपन्यास लिखना और एक व्यंग्य उपन्यास लिखना ये सभी बहुत अलग बातें हैं।