लिखकर भी मिट नहीं पाया अपराध बोध

लिखकर भी मिट नहीं पाया अपराध बोध

भोपाल । हिंदी की जानी-मानी कथाकार चित्रा मुद्गल का सारस्वत अभिनंदन हिंदी भवन में किया गया। उनका सम्मान उपन्यासकार-कथाकार संतोष चौबे, विनीता चौबे ने शाल, श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह देकर किया। इस मौके पर चित्रा मुद्गल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए उपन्यास पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा पर केंद्रित ‘कबूलनामा’ का मर्मस्पर्शी पाठ करते हुए कहा कि मैं स्वीकार करती हूं। यह भी कि ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203’, नाला सोपारा लिख लेने के बाद भी मैं उस अपराध बोध से मुक्त नहीं हो पाई हूं, जिससे मुक्ति पंक्ति-दर-पंक्ति की पगडंडियों की माटी, गहरी धंसी, तीखी , नुकीली कंकड़ियों को उचकाते, बीनते, बीनकर उखाड़ फेंकते उन रास्तों को तलाशती रही और सोचती रही, जिन पर चलते हुए खोज लूंगी, उन्हें और चिन्हित कर सकूंगी। उन अपराधियों को जो मुझे मुक्त कर देंगे उस अपराध बोध से, स्वयं ही यह कबूल कर लिया फिजूल ही तुम परिताप में घुल रही हो जो अपराध तुमने किया ही नहीं उसके लिए स्वयं को दोषी क्यों ठहरा रही हो। हो सकता है वह अपराध तुम्हारी बुजुर्ग पीढ़ी से हुआ हो या बुजुर्ग पीढ़ी की पूर्व पीढ़ी से या पूर्व पीढ़ी की पूर्व पीढ़ी से या उस पूर्व पीढ़ी की पूर्व पीढ़ी से। तुमने यदि अपनी कोख से किसी विकलांग शिशु को जन्म देकर उसे घर परिवार के लिए कलंक मानकर उठाकर कूड़े में फेंक दिया होता तो दोषी तो तुम तब होती। उन्होंने अपने कबूलनामें के अंत में कहा कि पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा मेरी वही आत्मस्वीकृति है, मुक्त होनी चाहती हूं मैं इस कलंक से। मेरे लिए दुआ कीजिए... हिंदी भवन के महादेवही कक्ष में कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा ने चित्रा मुद्गल के समग्र रचनात्मक योगदान पर प्रकाश डाला। कथाकार-चित्रकार प्रभु जोशी ने चित्रा जी के सृजन पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन विनय उपाध्याय ने किया।