कोविड में अन्य बच्चों की मददगार बनी किशोरियां शिक्षा बाल श्रम बाल

कोविड में अन्य बच्चों की मददगार बनी किशोरियां शिक्षा बाल श्रम बाल

 भोपाल। कोविड का दौर हर किसी के जीवन में संघर्ष भरा रहा।बच्चे भी इससे अछूते नहीं थे। इनके बीच हम बात कर रहे हैं राजधानी की बस्तियों मेंरहने वाली उन किशोरियों की जो खुद इस परिस्थिति को झेल रही थी। इसके बाद भी किसी ने बच्चों को बाल श्रम और बाल विवाह से बचाया तो किसी ने उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने

बच्ची को चाइल्ड ट्रैफिकिंग से बचाया

मनोविज्ञान में अलका की रूचि है। कोविड के दौरान अलका ने महसूस किया कि बच्चे बेहद तनाव में है। अलका ने एक बॉक्स लगाया जिसमें सभी अपनी समस्या लिखकर डाल सकते थे। इस दौरान स्कूल ना जा पाने, अभिभावकों के झगड़े, घर में पिटाई जैसी अनेक समस्याएं बच्चों ने शेयर की। इसमें अलका ने हरसंभव मदद की। अलका ने बताया - ‘इस दौरान एक दिन एक 13साल की लड़की मोहल्ले में भटकती नजर आई। उसकी हालत देखकर सभी उसे पागल समझ रहे थे। पता लगा तो मैंने बात की। उसने बताया कि तीन-चार लड़कों ने उसे घर में बंद करके रखा था। वह किसी तरह भागी,लेकिन उसे पागल समझ कर कोई उसकी

बच्चों को दोबारा जोड़ा शिक्षा से

पैसों की कमी की वजह से सरिता को खुद ट्यूशन छोड़नी पड़ी। कोविड में उसे महसूस हुआ कि उसके जैसे कई बच्चे होंगे जो ट्यूशन नहीं जा पाते होंगे और अब तो स्कूल भी बंद हैं। सरिता ने घर में फ्री क्लासेस शुरू की। धीरे-धीरे काफी बच्चे आने लगे। बावजूद, बहुत सारे बच्चे काम पर जाते थे और स्कूल छोड़ चुके थे। सरिता ने घर-घर जाकर बात की और कहा कि वह पढ़ाने के साथ ही दूसरी एक्टिविटीज भी बच्चोंको सिखाएगी। ज्यादा बच्चे होने पर सरिता ने उनके लिए वीडियो बनाए और साथ ही यूट्यूब पर मौजूद वीडियो लिंक भी भेजे ताकि बच्चों को पढ़ने में मदद मिले। सरिता ने बताया - ‘सरकारी स्कूल में भी आठवीं के बाद 

बाल विवाह रुकवाया

पल्लवी मोहबे, दस वर्ष की उम्र में बचपन संस्था से जुड़ी थी। साथ काम करते हुए पल्लवी पहले बाल पंचायत की प्रवक्ता बनी और फिर अध्यक्ष। इस दौरान पल्लवी ने दो बाल विवाह रुकवाने का प्रयास किया और सफल रही। साथ ही उन्होंने लॉकडाउन के बाद स्कूल छोड़ चुके चार बच्चों का रीएडमिशन भी कराया। पल्लवी के शब्दों में - ‘बस यही चाहती हूं कि हर बच्चे को उसका अधिकार मिल सके। कोविड के दौरान बच्चों और बस्ती के अन्य लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के लिए जागरूक किया। इस समय पैसे ना होने से बस्ती की लड़कियां सेनेटरी पैड नहीं खरीद पा रही थी। हमने क्राउड फंडिंग की और मिलान संस्था के साथ मिलकर