कैप्टन विक्रम बत्रा और टाटा परिवार के योगदान पर हुई चर्चा

कैप्टन विक्रम बत्रा और टाटा परिवार के योगदान पर हुई चर्चा

यंग थिंकर्स फोरम के रीडिंग क्लब द्वारा आयोजित पुस्तक परिचर्चा में दो पुस्तकों पर चर्चा की गई। फोरम की यह 44वीं पुस्तक परिचर्चा स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी में हुई। इस पुस्तक परिचर्चा में प्रतीक्षा एम. तिवारी द्वारा लिखित किताब राष्ट्र गौरव रतन टाटा पर अंकित सिंह तथा जीएल बत्रा द्वारा लिखित किताब परमवीर विक्रम बत्रा - द शेरशाह आफ कारगिल की समीक्षा आरजीपीवी के अंतिम वर्ष की छात्रा नितिशा त्रिवेदी ने की। समीक्षा करते हुए अंकित सिंह ने बताया कि जब ईरान में मुस्लिम आक्रांताओं का आगमन हुआ तो वह संरक्षण के लिए भारत के गुजरात में आकर बस गए। तब से लगभग दो सदी के लंबे समय में सर नुसेरवंजी टाटा से रतन नवल टाटा तक सभी ने देश को वह सब कुछ दिया जिसके होने से पश्चिमी देश इतराते थे। 1909 में भारत का पहला प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान आईआईएस बंगलुरु, एशिया का सबसे बड़ा कैंसर और लुकेमिया अस्पताल का निर्माण भी टाटा समूह ने करवाया।

रेडियो पर कहा था- यह दिल मांगे मोर

नितिशा त्रिवेदी ने बताया हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे विक्रम बत्रा ने पालमपुर में स्कूल शिक्षा के बाद चंडीगढ़ में स्नातक की पढ़ाई की जिसके दौरान उन्होंने एनसीसी का सी सर्टिफिकेट हासिल किया और दिल्ली में हुई गणतंत्र दिवस की परेड में भी भाग लिया जिसके बाद उन्होंने सेना में जाने का फैसला कर लिया। जून 1999 में कारगिल युद्ध में ही वे कैप्टन के पद पर पहुंच गए। इसके बाद कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को श्रीनगर-लेह मार्ग के ऊपर अहम 5140 चोटी को मुक्त करवाने की जिम्मदारी दी गई। कैप्टन ने अपने टुकड़ी का बखूबी नेतृत्व किया और चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद उन्हें रेडियो पर अपनी जीत पर कहा ये दिल मांगे मोर, जो हर देशवासी की जुबां पर चढ़ गया। बत्रा की टुकड़ी को इसके बाद 4875 की चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। 7 जुलाई 1999 को चोटी पर भारत का कब्जा होने से पहले उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ कई पाकिस्तान सैनिकों को खत्म करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। कैप्टन बत्रा की बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र" का सम्मान दिया गया। 4875 की चोटी को भी विक्रम बत्रा टॉप से जाना जाता है।