बलिदानियों की चरण रज और सआदत खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जैसे नायकों की गाथा कहती प्रदर्शनी

बलिदानियों की चरण रज और सआदत खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जैसे नायकों की गाथा कहती प्रदर्शनी

IamBhopal गणतंत्र दिवस को लेकर शहर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है जिससे देशभक्ति की अलख तो जगती ही है साथ ही उन गुमनाम शहीदों का स्मरण करने का मौका भी मिलता है जो कि अतीत की स्मृतियों में कहीं धुंधले पड़ गए। स्मृति-पटल पर उन्हें पुन: अंकित करने के मौके राष्ट्रीय पर्व के माध्यम से मिलते हैं, ऐसा ही प्रयास जीपी बिड़ला संग्रहालय में किया गया है, जहां शहरवासी अपने बच्चों व परिवार के साथ उन अमर शहीदों को नमन करते हुए उनके बारे में जान सकते हैं जिसके बारे में बहुधा पढ़ने को नहीं मिलता। इसके साथ ही शहीदों के गांवों और उनकी कर्मस्थली की मिट्टी को भी यहां रखा गया है जिसका संग्रह पुरातत्वविद डॉ.नारायण व्यास ने किया है। संग्रहालय के क्यूरेटर बीके लोखंडे ने बताया कि छायाचित्र प्रदर्शनी में लगे फोटोज का आलेख व चित्र स्वराज संचालनालय के द्वारा तैयार किए गए हैं।

75 पवित्र स्थलों की मिट्टी का प्रदर्शन

शहीदों की मिट्टी की बारे में डॉ. व्यास ने बताया कि यह शहीदों के जन्म, बलिदान एवं उनसे संबंधित स्थलों से एकत्रित की गई 75 पवित्र स्थलों की चरणरज है। इसमें प्रमुख रूप से अमझेरा के शहीद राणा बख्तावर सिंह एवं उनके कई साथी जिन्हें फांसी हुई, जलियांवाला बाग की मिट्टी, सुभाष चन्द्र बोस के जन्म स्थान कटक की मिट्टी, प्रयागराज में शहीद हुए चन्द्रशेखर आजाद की मिट्टी, बाबासाहेब आंबेडकर के जन्म स्थान की मिट्टी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे शिवपुरी, अगस्त क्रांति मैदान मुंबई की मिट्टी, उज्जैन के स्वतंत्रता सेनानी सूर्य नारायण व्यास, विष्णु श्रीधर वाकणकर, अनन्त लाल व्यास, राजस्थान के शहीदों के जन्म और बलिदान स्थलों की चरणरज का संग्रह है। शुभारंभ के अवसर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के प्रमुख डॉ. मनोज कुमार, अतिरिक्त केंद्रीय अभिलेखागार से डॉ. राजन सिह, डॉ. व्यास, डॉ.पंकज पाठक, दंत्तोपंत ठेंगड़ी भवन से डॉ. मुकेश मिश्र, डॉ. आलोक गुप्त, डॉ. ललित गौर आदि ने सहभागिता दी।

अंग्रेज भाग खड़े हुए

इंदौर के क्रांतिकारी शहीद सआदत खान के नेतृत्व में 1 जुलाई 1857 को क्रांति की तोपें गड़गड़ा उठी थी। इस दिन सुबह 8 बजे सआदत खान, भाई सरदार खां, भागीरथ सिलावट, हीरासिंह जमादार और अन्य साथी रेसीडेंसी कोठी जा पहुंचे, उस समय कर्नल एचएम डूरान्ड रेसीडेंसी कोठी में अपनी टेबल पर काम कर रहा था। सआदत खां ने कर्नल डूरान्ड से बात करनी चाही पर उसने सआदत खां को अपशब्द कहे जिसका उन्होंने विरोध किया। सआदत खां के आदेश पर होल्कर सेना के तोपची महमूद खां ने तोप का पहला गोला रेसीडेंसी कोठी पर दागा। इस हमले में 34 अंग्रेज मारे गए और कर्नल डूरान्ड को ओल्ड सीहोरा रोड से इंदौर छोड़कर भागने पर विवश होना पड़ा। 1 अक्टूबर 1874 की सुबह क्रांतिकारी सआदत खान को फांसी दी गई।

काकोरी कांड में भूमिका

राजेंद्रनाथ लाहिड़ी का जन्म तत्कालीन बंगाल के पबना जिले के मोहनपुर गांव में 29 जून 1901 को हुआ था। काकोरी कांड में अपनी अहम भूमिका से अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाने वाले प्रमुख अभियुक्त के रूप में उन्हें पहचाना गया। उन्हें 18 दिसंबर 1927 को गोंडा के जिला कारगार में अपने साथियों से दो दिन पहले फांसी दे दी गई।

भीमा नायक को भेजा पोर्टब्लेयर

तत्कालीन बड़वानी राज्य के पंचमोहली क्षेत्र में जन्में भीमा नायक ने 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी थी। उनका प्रभाव क्षेत्र पश्चिम में राजस्थान के क्षेत्रों से लेकर पूर्व में नागपुर तक फैल चुका था। 1867 में इन्हें गिरμतार कर दोष सिद्ध करते हुए पोर्टब्लेयर भेजा गया, जहां 29 दिसंबर 1876 में उन्होंने आखिरी सांस ली।