अब फिल्मों में सिक्स पैक एब्स जरूरी नहीं जो कला के पहलुओं को समझते हैं बेहतर परफॉर्म कर पाते हैं

अब फिल्मों में सिक्स पैक एब्स जरूरी नहीं जो कला के पहलुओं को समझते हैं बेहतर परफॉर्म कर पाते हैं

आश्रम वेब सीरीज एक फिक्शन कहानी है। मैं भी इस वेब सीरीज का हिस्सा रहा हूं। जिसके माध्यम से लोगों को अंधविश्वास के प्रति जागरुक करने की कोशिश की गई है। यह कहना था, एक्टर तुषार पांडे का, जो कि मंगलवार को फिल्म टीटू अंबानी के प्रमोशन के लिए पीपुल्स यूनिवर्सिटी पहुंचे, साथ ही एक्ट्रेस दीपिका सिंह गोयल भी मौजूद रहीं। इस दौरान उन्होंने आईएम भोपाल से खास बातचीत की। इस मौके पर कलाकारों का स्वागत पीपुल्स यूनिवर्सिटी की रजिस्ट्रार डॉ. नीरजा मलिक ने किया। तुषार ने कहा कि पहले फिल्मों में सेट ट्रेंड था कि हीरो के सिक्स पैक एब्स होंगे। ओटीटी आने के बाद अब ये ट्रेंड बदल रहा है। अब एक्टर के सिक्स पैक एब्स होना जरूरी नहीं है, एक्टर की एक्टिंग को महत्व दिया जाता है और कहानी को पसंद किया जाता है।

टीवी सीरियल्स के काम से अलग और चैलेंजिंग

दीपिका कहती हैं कि टीवी पर मैंने जितना काम किया है, फिल्में में बहुत अलग और चैलेंजिंग है। उन्होंने कहा कि फिल्म में टीटू अंबानी में मौसमी का किरदार मेरे दिल के बहुत करीब है यह एक ऐसी लड़की है, जिसने अपनी जिंदगी के कुछ रूल्स बनाए हैं और वह अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं कर सकती। यह फिल्म एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो कि शादी के बाद भी अपने पैरेंट्स की मदद करना चाहती है। मौसमी आज की लड़की है। वह अपने हस्बैंड टीटू से बहुत प्यार करती है और उतना ही अपने पैरेंट्स को चाहती है। उसके अपने कुछ प्रिंसिपल्स हैं। वह मम्मी-पापा की श्रवण कुमार बनना चाहती है। शादी के बाद भी उनकी हेल्प करना चाहती है। लेकिन क्या मम्मी-पापा हेल्प ले पाते हैं, क्योंकि हम ऐसी सोसायटी से बिलांग करते हैं, जहां लड़की के यहां का पानी पीना पाप माना जाता है। मगर मौसमी शादी के बाद भी ऐसी चीजों को नहीं मानती है। मेरे पति रोहित राज गोयल ने फिल्म को डायरेक्ट किया है। शुरू से ही वो डायरेक्टर थे और मैं एक्टर। जिस चीज से अपनी शुरुआत होती है, वह हमेशा वैसे की वैसी ही रहती है। हम दोनों ही मैच्योर हो गए हैं, यह मेरी पहली फिल्म है। टेलीविजन से फिल्मों में आना मेरे लिए बहुत टफ निर्णय था। लेकिन मुझे कुछ अलग करना था, इसलिए फिल्मों की ओर रूख किया। इस फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद ही फिल्म में अभिनय करने का निर्णय लिया। टीवी पर जो रोल मुझे मिल रहे थे, वह सब कर चुकी थी, मुझे कुछ नया करना था। मुझे लगता है एक्टिंग में जो चीज चाहिए होती है वह इमोशंस के साथ कैरेक्टर पर फोकस करना होता है। फिल्म में एक डायलॉग है एक लड़के से कभी पूछा नहीं जाता कि वह शादी के बाद अपने मां-बाप का खयाल रखेगा या नहीं, पर एक लड़की से ही क्यों एक्सपेक्ट किया जाता है। आखिर एक माता-पिता इकलौती लड़की को पाल-पोसकर बड़ा किया है, उसके एजुकेशन पर इनवेस्ट किया है, ऐसे में वह अपने मां-बाप को नहीं देखेगी, तब कौन देखेगा? कुछ ऐसा मौसमी का किरदार है, जो हंसाते-गुदगुदाते और सांग के जरिए अपनी बात कहती है, जिससे दर्शकों को अपनी कहानी लगेगी। मुझे लगता है, ऐसे सेंसिटिव सब्जेक्ट पर बातें होनी चाहिए, जो समय की मांग है।

ट्रेनिंग के बाद रखा अभिनय में कदम

1अभिनय की दुनिया में अपनी जर्नी की शुरुआत के बारे में तुषार कहते हैं, मैं दिल्ली से हूं। जब स्कूल में पढ़ता था तो डांस और एक्टिंग करता था। स्पोर्ट्स में भी रुचि थी। मैंने सोचा था कि जो भी करूंगा, उसकी ट्रेनिंग और पढ़ाई के साथ करूंगा। डीयू में पढ़ने के दौरान थिएटर करता था। फिर नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा (एनएसडी) जॉइन कर लिया। अभिनय की पढ़ाई और प्रशिक्षण का सिलसिला यहीं नहीं थमा। इसके बाद मैं लंदन स्कूल आॅफ परफॉर्मिंग आर्ट्स चला गया। यानी इस तरह मैंने करीब 6-8 साल एक्टिंग की पढ़ाई की है। मेरा मानना है कि अगर आप किसी फील्ड में मेहनत करते हैं और उसकी पढ़ाई करते हैं तो कला को समझकर बेहतर परफॉर्म कर पाते हैं। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूं। अच्छा काम करने की कोशिश कर रहा हूं, इसलिए कुछ आॅफर किए गए प्रोजेक्ट को ना भी कह देता हूं। कोई भी प्रोजेक्ट चूज करते समय यह देखता हूं कि कहानी और किरदार आॅडियंस को कितना कनेक्ट करता है।

साइन करने से पहले ‘छिछोरे’ की स्क्रिप्ट पढ़ी

तुषार कहते हैं कि एक्टर की काबिलियत तभी दिखती है, जब वह अलग-अलग जॉनर में अच्छा काम करता है। किसी इमेज में बंधकर नहीं रहे। हर बार अपने काम से दर्शकों को सरप्राइज करे। जब छिछोरे फिल्म मिली तो पहले मैंने स्क्रिप्ट पढ़ीं उसके बाद फिल्म को साइन किया। यह मेरे लिए टर्निंग पांइट था, वहीं आश्रम में मुझे अलग कैरेक्टर मिला जो दर्शकों को काफी पसंद आया। साउथ की फिल्मों को बॉलीवुड में रिमेक बनने पर उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में न तो डायरेक्टर की कमी है और न ही राइटर की। कहानियां भी बहुत बन रही हैं।