दिमाग में जमे दुख-दर्द को बाहर निकालें ताकि इमोशनल कॉन्स्टिपेशन से बच सकें

दिमाग में जमे दुख-दर्द को बाहर निकालें ताकि इमोशनल कॉन्स्टिपेशन से बच सकें

 जिस तरह खाली गिलास में हम कुछ भी भर सकते हैं लेकिन भरे गिलास में नहीं ठीक उसी तरह यदि दिमाग दुख, दर्द, हादसे या घटनाओं का पुराने बुरे अनुभवों से भरा हो तो उसमें नई चीजों के प्रवेश की जगह नहीं रहती। बार- बार पुराने नकारात्मक विचार कभी पढ़ाई करते तो कभी काम करते हुए याद आने लगते हैं। इसके अलावा टीएजर्स को गुस्सा, माता-पिता से झगड़ा और उसके बाद तेजी से सुसाइडल थॉट्स आने लगते हैं क्योंकि गुस्से को मैनेज करना नहीं आता। जिसके चलते आवेश में आकर टीनएजर्स हो या बड़े सुसाइड का रास्ता अपनाते हैं। मनोचिकित्सकों व वेलनेस थेरेपिस्ट के मुताबिक हम बच्चों को शिक्षित तो करते हैं लेकिन आतंरिक शुद्धि की तकनीक नहीं सिखाते। हम गुस्सा आने पर उसे कैसे मैनेज करें, भावनाओं को कैसे हैंडल करे यह नहीं जानते और जब यह सब कुछ दिमाग में भरता चला जाता है तो इमोशनल कॉन्स्टिपेशन का रूप लेता है और बुरा बर्ताव या चिड़चिड़ेपन, गुस्से, उदासी, एंजाइटी, तनाव या डिप्रेशन के रूप में बाहर आता है। इसके लिए इमोशनल फ्रीडम टेक्निक (ईएफटी) इस्तेमाल की जाती है जिसके जरिए वेलनेस एक्सपर्ट व्यक्ति को इस परेशानियों से बाहर निकालने की तकनीक सिखाते हैं। आजकल इसके बारे में एक्सपर्ट व टेड टॉक में स्पीकर बात कर रहे हैं। इस टेक्निक को न्यूरोलिंग्यूस्टिक एक्सपर्ट गैरी क्रेग ने इजाद किया था।

जमे हुए विचारों का वेंटिलेशन जरूरी

पुरानी चीजों को खाली करना बहुत जरूरी है। हर व्यक्ति कोशिश करता है कि वो स्वस्थ खाना खाए। शरीर का सिस्टम ऐसा है कि वो पौष्टिक चीजों को अवशोषित करके बेकार चीजों को शरीर से बाहर कर देता है, उसी तरह दिमाग में भी अच्छी चीजों भरने के लिए बुरी बातें निकालने की जरूरत होती है। दिमाग का भी डाइजेस्टिव सिस्टम होता है, जब वो अनावश्यक व नकारात्मक यादों व विचारों से भर जाता है तो दिमाग में बुरे विचार आने लगते हैं। कई बार लोग बैठे-बैठे रोने लगते हैं यह सभी कुछ इसके लक्षण है। इसके अलावा जब कोई किसी को सुनने को तैयार नहीं होता तब भी ऐसी तकलीफ होती है। हमारे एजुकेशन सिस्टम में लाइफ स्किल्स पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जा रहा कि संकट का सामना कैसे करना है। परेशान होने पर भावनाओं को किस तरह दूसरों के साथ या खुद के साथ शेयर करना है। बच्चों के पास यह टेक्निक ही नहीं है कि इनसे बाहर कैसे निकले और जब कुछ समझ नहीं आता तो वे सुसाइड करते हैं। सेल्फ इमेज को लेकर इतने कॉन्शियस हो रहे हैं कि अपनी बात ही नहीं कर पा रहे, सिर्फ यह सोचकर कि सामने वाला क्या सोचेगा, इस तरह जमे हुए विचारों का वेंटिलेशन नहीं होता पाता। डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, मनोचिकित्सक

खुद की खुशी के लिए लिखें और बात करें

कपल्स के साथ ऐसे इश्यू होते हैं जिसमें एक व्यक्ति दूसरे की बात या दर्द को समझने या सुनने को तैयार नहीं होता। ब्रेकअप होने पर दोस्तों के साथ परेशानी होने पर भी बात सुनने या सुनाने की स्थिति नहीं बचती। ऐसे में यह इमोशन बाहर नहीं निकल पाता और व्यक्ति घुटन महसूस करने लगता है, इसलिए इन बातों को डायरी या पेपर पर लिख लें। पहले के समय लिखने का चलन बहुत बढ़िया था, जिसकी वजह से मन की बहुत सारी ऐसी बातें जो कोई सुनने को तैयार नहीं या किसी से कहीं नहीं जा सकती वो कागज पर उतार दी जाती थीं लेकिन अब हाथ में मोबाइल होने से लिखने का चलन कम हो गया। अपनी पूरी स्थिति लिखेंगे तो दिमाग से वो बात निकल जाएगी। खुद को खुश को रखने के लिए लिखना जरूरी है। यदि सामने वाला सुनने को तैयार है तो सब कुछ दिल व भाव के साथ उसे सुना दें। डॉ.रितु पांडे शर्मा, माइंडफुलनेस एक्सपर्ट

ईएफटी निगेटिव इमोशंस लाइफ का हिस्सा, रिलीज करना सीखें

इमोशनल फ्रीडम टेक्निक को न्यूरोलिंग्यूस्टिक एक्सपर्ट गैरी क्रेग ने इजाद की थी, जिसमें व्यक्ति शरीर के अलग-अलग पाइंट पर टैपिंग यानी थपथपाकर अपने गुस्से या तनाव को रिलीज करता है। यह टेक्नीक काफी वेलनेस एक्सपर्ट इस्तेमाल करते हैं। इसमें समझाया जाता है कि निगेटिव इमोशन भी लाइफ का हिस्सा है, इससे बचा नहीं जा सकता लेकिन इसे दबाने पर यह बुरे स्वरूप में सामने आता है तो इससे बाहर निकलने की तकनीक पता होना चाहिए। यह एक कई सीटिंग्स में सीखी जाने वाले टेक्नीक है, जिसे बाद में खुद प्रैक्टिस कर सकते हैं। पढ़ाई, कॅरियर, शरीर संबंधी, लुक संबंधी, कपल इश्यू, ब्रेकअप इश्यू, बुलिंग आदि की स्थिति में इमोशनल टॉक्सिन इकठ्ठे हो जाते हैं जिसकी वजह से सुसाइडल थॉट्स आते हैं। इसका असर फिजिकल हेल्थ पर पड़ता है। नतीजा हार्मोनल असंतुलन, सिर दर्द, तनाव बना रहना और व्यवहार पर पड़ता है। सोशल मीडिया पर वेलनेस एक्सपर्ट रिरी त्रिवेदी इन दिनों इस विषय पर बात कर रही है कि इमोशन सही नहीं है तो नींद व सेहत पर भी असर पड़ेगा।