तबले पर सुनाया बादलों का गरजना झरनों का बहना और शंख की आवाज

तबले पर सुनाया बादलों का गरजना  झरनों का बहना और शंख की आवाज

 भारत भवन में चल रहे युवा-8 समारोह के अंतर्गत बुधवार को वादन की तीन सभाएं आयोजित की गई। जिसमें पहले सभा आयुष मोरोणे की सितार वादन की रही। जिसमें उन्होंने राग मियां की तोड़ी में सितार वादन किया। इनके साथ तबले पर रामेंद्र सिंह सोलंकी ने संगत की। इसकी अगली कड़ी में ‘संगीत और नृत्य का हृदयप्रदेश’ विषय पर तीन वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए। जिसमें प्रवीण शेवलीकर ने कहा कि मप्र का इतिहास बहुत विस्तृत और विशाल है और मप्र में संस्कृति का विकास प्रत्येक क्षेत्र में हुआ है। कला परिषद की स्थापना, भारत भवन हो, मप्र के विकास में हमेशा से ही कला व कला मनीषियों का योगदान रहा है। उन्होंने मैहर में अलाउद्दीन खान, ग्वालियर में पंडित कृष्णा राव पंडित, कुमार गंधर्व, उस्ताद अली खान, जहांगीर खान तबला वादक और इंदौर के आमिर खान के योगदान पर विस्तृत चर्चा की।

वर्षा ऋतु की ध्वनियों को सुनाया तबले पर

प्रस्तुति में उस्ताद सलीम अल्लाह वाले ने हारमोनियम पर लहरा और तबले पर संगत की। सभी प्रस्तुतियों में विशेष रूप से वर्षा ऋतु में होने वाले मनमोहक दृश्यों, ध्वनियों को तबला वादन में बीच-बीच में प्रस्तुत किया गया। जैसे ही तबले पर बादलों का गरजना, वर्षा की बूंदों का जमीन पर गिरना, पहाड़ों में झरनों का बहना आदि मन को छू लेने वाली प्रस्तुति दी, तो उपस्थित श्रोताओं झूम उठे। इसके साथ ही बीच-बीच में शंख की आवाज के साथ शुद्ध शास्त्रीय तबला वादन ने भी समां बांध दिया।

बनारस और पंजाब घराने की 200 साल पुरानी बंदिशें की पेश

कार्यक्रम में आगे बढ़ते हुए मोईन अल्लावाले ने अपने साथी कलाकारों के साथ ताल सप्तक की प्रस्तुति दी। जिसकी शुरूआत उन्होंने तबला वृंद से की। यह प्रस्तुति श्रावण मास में भगवान शिव के तांडव पर आधारित रही। इस प्रस्तुति को प्रदेश के जाने- माने तबला वादक उस्ताद सलीम अल्लाहवाले ने अपने शिष्यों द्वारा तैयार किया। इसके बाद सभी तबला वादकों ने एक साथ तीन ताल में दिल्ली, अजराड़ा, फरुर्खाबाद, लखनऊ, पूरब, बनारस और पंजाब घराने की लगभग 200 वर्ष पूर्व की ऐतिहासिक बंदिशें प्रस्तुत की। जिनमें पेशकार, कायदे, रेले, टुकड़े, परने व अद्भुत फरमाइशे, बेदम चक्करदार, नोहक्का चक्करदार, कमाली चक्करदार प्रस्तुत की।