इस बार मुंबई-दिल्ली नहीं जा पाएंगीं शहर के कलाकारों द्वारा बनाई जाने वाली मूर्तिया

इस बार मुंबई-दिल्ली नहीं जा पाएंगीं शहर के कलाकारों द्वारा बनाई जाने वाली मूर्तिया

जबलपुर । जिले में करीब 1 हजार मूर्तिकार हैं जो जुलाई तक 50 से 60 हजार प्रतिमाएं तैयार कर लेते थे। परंतु इस वर्ष अभी तक प्रतिमाएं बनाने का काम ठीक तरह से शुरु नहीं हुआ है। जबलपुर सहित आसपास के शहरों सागर,दमोह, नरसिंहपुर, करेली, गाडरवारा, इटारसी, सिंगरौली, मंडला, सिवनी और अन्य राज्यों महाराष्ट्र एवं दिल्ली तक गणेश और दुर्गा प्रतिमाएं जाती हैं। लेकिन इस बार कोरोना के कारण एक भी प्रतिमा की आॅर्डर न तो शहर से आया और ना ही बाहरी जिलों से भी नहीं आया है। जिसके कारण इस बार दूसरे राज्यों में प्रतिमाएं जाने में असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है। वहीं जिला प्रशासन ने भी इस बार छोटी प्रतिमाएं बनाने की निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण मूर्तिकारों की खुशियां निगल चुका है,कोरोना महामारी के कारण मूर्तिकार बेरोजगार हो गए है। आगामी 22 अगस्त को गणेश चतुर्थी के पहले तक शहर में हजारों की संख्या में गणेश प्रतिमाएं बनकर तैयार हो जाती थीं और इसी के साथ संस्कारधानी में पर्वो की चहल-पहल भी शुरु हो जाती थी। लेकिन इस बार मूर्तिकारों के पंडालों में अजीब सी खामोशी छाई है। ये खमोशी ज्यादा दिनों तक टिकी रही तो कई घरों के चूल्हे बुझने की नौबत आ जाएगी।

स्वयं की पूंजी लगाकर छोटी प्रतिमा बना रहे

शहर के मूर्तिकारों ने वर्तमान में अपनी लागत लगाकर मध्यम ऊंचाई तक की मूर्तियां जिसमें 4 से 5 फीट ऊंची मूर्तियां तक बनाना शुरू कर दिया है। शहर में सबसे ज्यादा मूर्ति शीतलामाई क्षेत्र में बनाई जाती हैं। जहां 60 से 70 मूर्तिकार केवल मूर्तिकला के भरोसे जीवन यापन करते हैं। उनके वर्ष भर की कमाई केवल गणेशोत्सव व दुर्गोत्सव के दौरान प्रतिमाएं बनाकर होती है। लिहाजा स्वयं खतरा मोल लेते हुए मूर्तिकारों ने अपनी पूंजी लगाकर छोटी प्रतिमाओं का निर्माण करना शुरू कर दिया है। मूर्तिकार सबसे ज्यादा घर-घर स्थापित की जाने वाली प्रतिमाएं बनाने में ध्यान दे रहे हैं।

यहां बनती हैं प्रतिमाएं

शहर में शीतलामाई, घमापुर, बड़ी खेरमाई, अधारताल, चेरीताल, गढ़ा फाटक, मौलाना की गली, गढ़ा, मिलौनीगंज, रांझी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का निर्माण होता है। इस काम में शहर के करीब 1 हजार से ज्यादा मूर्तिकार लगे हुए हैं।

पीओपी की प्रतिमाएं नहीं घुलती पानी में

नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के संयोजक मनीष शर्मा ने बताया कि पीओपी की मूर्तियां पानी में नहीं घुलती है जिससे तालाब,नदियों में जल प्रदूषण होता है। जिसकी बिक्री पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने तालाबों और नदियों में मूर्तियां विसर्जन पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद न्यायालय ने विसर्जन कुंड में प्रतिमा विसर्जन कराने के निर्देश दिए थे। जबकि इंटर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सर्कुलर जारी कर पीओपी की मूर्तियों की बिक्री पर रोक लगा दी थी। लेकिन चायना से आने वाली ये छोटी-छोटी मूर्तियों पर रोक नहीं लग पाई है।