राखी के लिए भी ‘वोकल फॉर लोकल’

राखी के लिए भी ‘वोकल फॉर लोकल’

बाजार में राखियों की दुकान भले न लगी हों, लेकिन वॉट्सएप पर राखी का बाजार गुलजार है। शहर की महिलाएं त्योहारी सीजन को वोकल फॉर लोकल के साथ मना रही हैं। बदलाव के इस दौर में महिलाएं अपनी आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहीं हैं। नया भोपाल हो या पुराना भोपाल सभी जगह महिलाएं अपने-अपने घरों से राखियां बनाते हुए स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। यह जागरूकता चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर उठी आवाज के बाद से बढ़ी है। लोकल राखियां 8 रुपए से लेकर 250 रुपए तक की कीमत में उपलब्ध हैं।

गुजराती समाज राखियों के जरिए दे रहा रोजगार

गुजराती समाज मंडल की निशा दोषी, स्मिता चंदराना, सरोजबेन पटेल और अर्चना व्यास ने पांच महिलाओं को समाज के सदस्यों के लिए राखी बनाने का काम दिया। निशा कहती हैं-लॉकडाउन के पहले तक हम गुजराती समाज भवन न्यू मार्केट में बैठकर ही सोशल डिस्टेंसिंग के साथ राखियां बनवा रहे थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद महिलाओं से कहा गया कि वह अपने घर से राखियां बनाने का काम करें। इस दौरान जितनी राखियां बनी उन्हें हमने अपनी-अपनी कॉलोनी से बिक्री करने के लिए घर पर रख लिया और वॉट्सएप के जरिए पब्लिसिटी शुरू की, जिनलोगों को राखी पसंद आई उन्होंने आर्डर्स भी किए हैं। हमने लगभग 4 हजार राखियां बनवाई हैं, जिसे कोई भी व्यक्ति संपर्क कर खरीद सकता है। इस तरह कई महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है।

सोशल डिस्टेंसिंग के साथ शेल्टर होम से बन रहीं राखियां

शाहजहांनाबाद में निर्भया महिला आश्रय गृह में रहने वाली महिलाओं को लगातार स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। शेल्टर होम में रहने वाली महिलाओं को रोजगार देकर उनकी आजीविका का प्रबंधन भी किया जाता है। पिछले 20 दिन से यहां राखियां बना रही हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का भी ख्याल रखा जा रहा है। हम सिंपल से लेकर डिजाइनर राखियां बनवा रहे हैं।

वॉट्सएप के जरिए हो रही राखियों की बिक्री

लॉकडाउन के पहले तक रचना नगर स्थित केंद्र से राखियां बनाई जा रही थीं, लेकिन अब जिन महिलाओं को राखियां बनाने का काम सौंपा गया था,वे अपने घर से राखियां बना रही हैं। वॉट्सएप ग्रुप बनाकर राखियों की डिजाइन और कीमत शेयर की तो काफी डिलीवरी हो चुकी हैं। मुंबई, दिल्ली और नोएडा से भी राखियों की डिलीवरी के आर्डर से मिले थे।