गुरुजी से संतूर सीखने पहुंची तो कहा था-बेटे थे, अब बेटी भी आ गई

गुरुजी से संतूर सीखने पहुंची तो कहा था-बेटे थे, अब बेटी भी आ गई

15 मई को शहर के कला मंदिर भारत भवन में पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा का लाइव कॉन्सर्ट होने वाला था। सुरों के सरताज को सुनने के लिए कई लोग बेताब थे। शिव-हरि (शिव कुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया) की जुगलबंदी से होने वाली उस शाम की रौनक का लाखों लोग इंतजार कर रहे थे। यह मौका भी करीब 8 साल बाद आने वाला था, लेकिन अफसोस इवेंट से कुछ दिन पहले ही 11 मई को पंडित शिव कुमार शर्मा ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। देश की पहली महिला संतूर वादक श्रुति अधिकारी ने कहा उन्होंने मुझे अपनी शिष्या तो बनाया ही साथ ही उन्हें अपनी बेटी का दर्जा भी दिया उनके जाने से मैं स्तब्ध हूं।

ऐसे फनकार जिंदगी में दोबारा नहीं मिलते

पंडित शिव कुमार शर्माजी के आकस्मिक निधन से बहुत दुखी हूं। वे जब भी भोपाल आए हैं उन्होंने हमेशा ध्रुपद संस्थान विजिट कर संस्थान के संगीतज्ञों को बहुत कुछ सिखाया। वे ध्रुपद संस्थान और हमसे खास प्रेम करते थे। जब भी वे बच्चों के साथ बैठते थे तो उनसे एक ही बात करते थे कि आप एक अच्छी जगह पर संगीत की शिक्षा ले रहे हैं उसका पूरा उपयोग करें। मैं जब भी उनके साथ रहता था संगीत से जुड़ी बातें सीखने और समझने का मौका मिलता था। ऐसे फनकार जिंदगी में दोबारा फिर नहीं मिलते। - अखिलेश गुंदेचा, पखावज वादक

जम्मू से ज्यादा भोपाल में संतूर बजाना पसंद था

15 मई को भारत भवन में होने वाले महिमा सीरीज के अंतर्गत बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया के साथ करीब 8 साल बाद श्रोताओं को उनकी जुगलबंदी सुनने को मिलने वाली थी। लेकिन अचानक पंडित शिवकुमार शर्मा का चले जाना संगीत जगत के लिए दुखद है। उन्होंने मुझे कहा था कि जम्मू और मुंबई से ज्यादा भोपाल में प्रस्तुति देना पसंद है। उन्हें मेरी लिखी एक कविता बेहद पसंद थी और कहते भी थे कि मैं जितना अच्छा संतूर नहीं बजाता उससे अच्छी कविता लिख लेते हो। यह उनका बड़प्पन था कि वे मेरी कविताओं के प्रशंसक रहे। - प्रेम शंकर शुक्ला, प्रशासनिक अधिकारी, भारत भवन

गुरुजी को 1983 मे ंबजाते सुना तो संतूर सीखने की ठानी थी

पंडित शिव कुमार शर्मा के निधन से स्तब्ध हूं। मेरे लिए गुरु से ज्यादा पिता तुल्य समान थे। 1983 में 9वीं क्लास में पढ़ती थी। तब भोपाल में एक कॉन्सर्ट में पंडित शिव कुमार शर्मा संतूर की परफॉर्मेंस देने आए थे। उस दिन मैंने उन्हें पहली बार सुना और घर आकर मम्मी से जिद्द करना शुरू कर दी कि मुझे संतूर ही बजाना सीखना है। उन्होंने कहा पहले सितार जो सीख रही हो वो पहले सीख लो और बेसिक मजबूत करो। इसी दौरान संस्कृति विभाग की स्कॉलरशिप का विज्ञापन निकला थी। मैंने मम्मी से पूछा कि क्या दुर्लभ इंस्ट्रूमेंट के तहत संतूर आएगा या नहीं। मम्मी ने कहा ये तो पता नहीं कि उनकी लिस्ट में संतूर आता है या नहीं। मैं खुद ही आॅफिस पहुंच गई मैंने संतूर की स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई कर दिया। कुछ दिन बाद इंटरव्यू के लिए कॉल आया और मेरा सिलेक्शन भी हो गया। जब मुझे साल 1983 में रिजल्ट मिला और उस लेटर में लिखा था कि अब आपको पंडित शिव कुमार शर्मा के साथ संतूर की स्कॉलरशिप दी जाती है और अब आपको उनसे सीखने को मिलेगा। मैं जब गुरुजी के पास संतूर सीखने के लिए मुंबई गई तब उन्होंने कहा कि मेरे पास दो बेटे है आज एक बेटी भी आ गई। वह दिन मेरे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गया। - श्रुति अधिकारी,संतूर वादिका