आरटीआई: सागर संभाग के तीन अफसरों पर 25-25 हजार रुपए जुर्माने के आदेश; 4 साल पुराने मामलों में सुनवाइयों से गैर हाजिर होने पर कार्रवाई

 07 Apr 2021 01:54 PM

भोपाल। सूचना के अधिकार कानून के प्रति बेरुखी और राज्य सूचना आयोग के आदेशों की उपेक्षा के मामले में सागर संभाग के वन विभाग और कृषि विभाग के 2 अफसरों पर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना किया गया है। राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने कृषि विभाग के तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी बीएल कुरील और वन विभाग के तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी हुकुमसिंह ठाकुर पर सूचना के अधिकार कानून की धारा 20 (1) के तहत यह जुर्माना लगाया। पन्ना नगर पालिका के उपयंत्री सुरेश साहू पर भी 25 हजार का जुर्माना किया गया है। सभी मामले चार साल पुराने हैं।

केस-1
पन्ना नगर पालिका परिषद के उपयंत्री सुरेश साहू पर 25 हजार रुपए का जुर्माना किया गया है। अपीलार्थी वीरेंद्र सिंह ने अक्टूबर 2017 में निर्माण कार्यों से संबंधित जानकारी चाही थी। इस मामले में आयोग में 13 सुनवाइयां चलीं। यह भी एक रिकॉर्ड है। साहू आदेश के बाद भी हाजिर नहीं हुए। इसलिए उन जुर्माना किया गया। 

केस-2
दमोह के आवेदक कृष्णकांत ने अगस्त 2016 में वन विभाग से झालौन रेंज के बारे में चार बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी, जो 30 दिन की समय सीमा में देने के योग्य थी। पहली सुनवाई अगस्त 2020 में हुई थी। उपस्थित अधिकारी ने बताया कि दो दिन पहले ही जानकारी भेज दी गई है। यानी 4 साल 10 दिन के विलंब से जानकारी दी गई। लेकिन इस विलंब का कारण नहीं बताया गया न ही कोई जवाब भेजा। इस वजह से उन पर जुर्माना हुआ और फैसले को सर्विस बुक में दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं।

केस-3
दमोह के आवेदक भरत चौबे ने कृषि विकास अधिकारी की लॉग बुक और टूर डायरी के बारे में जानकारी चाही थी, जो देने योग्य थी। किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी बीएल कुरील को इस मामले में सुनवााई के चार मौके दिए गए, लेकिन हर बार वे नदारद रहे। आयोग ने अपने आदेश और सूचना के अधिकार कानून की उपेक्षा को गंभीरता से लेते हुए धारा 20 (1) के तहत दोषी मानकर जुर्माने का फैसला सुनाया।

मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि सूचना के अधिकार के तहत हर आवेदन पर निर्णय लेना चाहिए। इसकी समय सीमा है। उनके स्तर पर क्रियान्वयन की स्थिति से यह स्पष्ट है कि उन्हें कानून में अपनी भूमिका का समुचित ज्ञान नहीं है। वे ऐसे एकमुश्त आवेदनों से परेशान होकर कोई निर्णय ही नहीं लेते। यह स्थिति उनके लिए जुर्माने की धारा 20 (1) की तरफ ला रही है, जबकि कई अस्पष्ट जानकारी वाले आवेदन वे अपने स्तर पर आसानी से खारिज कर सकते हैं, लेकिन यह भी उन्हें ज्ञात नहीं है। आयोग की सुनवाइयों की उपेक्षा भी गंभीर है।'