समलैंगिक ड्रामे में रोमांस का दिया तड़का, लेकिन फिल्म से मुद्दे की बातें ही गायब रहीं

 15 May 2021 01:12 AM

अजीब तर्क है कि एक लड़की बचपन से जींस/पतलून पहनती रही और ऑल-गर्ल्स स्कूल में पढ़ी तो बड़ी होकर लेस्बियन हो गई। फिर इसी तर्क से क्या कोई लड़का लड़कपन से सलवार पहने और ऑल बॉयज स्कूल में पढ़े तो बड़ा होकर गे हो जाएगा? लेखक-निर्देशक हरीश व्यास का रोमांटिक ड्रामा ‘हम भी अकेले तुम भी अकेले’ लड़की के पतलून पहनने के मुद्दे से शुरू होकर, देसी समलैंगिक समुदाय के तर्कों और परिवार में संघर्ष को दिखाने की कोशिश करता है। मगर असर पैदा नहीं करता। उनकी कहानी में नई पीढ़ी के उन युवाओं का कंयूजन है, जिन्हें नहीं पता कि वह ‘कौन’और क्या करना चाहते हैं। फिल्म की कहानी: समाज के दायरों से अदालत की सीढ़ियों तक बहस जारी है और अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं है। डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज हुई यह फिल्म इसी बहस की एक कड़ी है। जिसका नायक वीर (अंशुमान झा) लड़की को सगाई की अंगूठी पहनाने से पहले घर से भाग निकलता है तो नायिका मानसी (जरीन खान) तब गृहत्याग कर देती है, जब लड़के वाले देखने आए हैं। अलग-अलग राहों से निकले वीर और मानसी दिल्ली में मिलते हैं, क्योंकि वहीं उनके ‘पार्टनर’ रहते हैं। वीर अपने साथी अक्षय (गुरफतेह पीरजादा) के पास पहुंचता है तो मानसी को उसकी सखी निक्की (जाह्नवी रावत) रूम पर नहीं मिलती। निक्की अपने घर मैकलोडगंज गई होती है। दो किरदारों को सफर में संग दिखाती कहानी शुरू से अंत तक रतार नहीं पकड़ती। बात एक्टिंग की : अंशुमान झा अच्छे अभिनेता हैं मगर यह किरदार उनकी कॅरियर-यात्रा को आगे नहीं बढ़ाएगा। वहीं जरीन खान का कॅरियर खत्म है और इस फिल्म के बाद वह जहां थीं, वही रहेंगी। अंशुमान फिल्म निर्माता भी हैं। उन्हें भविष्य में कहानियां चुनने में सावधानी बरतनी चाहिए। फिल्म देखते हुए लगता है कि कुछ हिस्से मुख्य शूटिंग के बाद अलग से जोड़े गए।