काली मिर्च, सोंठ जैसे 11 फ्लेवर्स वाला गुड़, दिखने में बर्फी की तरह अट्रैक्टिव

 09 Jan 2021 12:48 AM

मध्यप्रदेश शासन की महत्वाकांक्षी योजना ‘एक जिला एक उत्पाद’ के अंतर्गत नरसिंहपुर जिले से देशविदेश में अपनी मिठास के लिए पहचाना जाने वाला ‘करेली गुड़’ और ‘गाडरवारा तुअर दाल’ का चयन किया गया है। इसी कड़ी में जिला प्रशासन नरसिंहपुर एवं किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग द्वारा शुक्रवार को भोपाल हाट में गुड़ मेले का शुभारंभ हुआ। इस मेले में करेली गुड़ अपने विभिन्न μलेवर्स के साथ शहरवासियों को मकर संक्रांति और लोहड़ी के पर्व के लिए उपलब्ध है। यह मेला दोपहर 12 बजे से शाम 7 बजे तक घूम सकते हैं।

भूख बढ़ाता है, पाचन ठीक करता है

नरसिंहपुर के करताज गांव से आए से आए गुड़ विक्रेता राकेश दुबे ने बताया कि 2011 से वे जैविक खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि गुड़ मेले में चार तरह के गुड़ लेकर आए हैं, जिसमें काली मिर्च, अजवाइन, सौंफ और लौंग μलेवर का गुड़ है। इसी तरह कुल 11 तरह का गुड़ तैयार किया जाता है, जिसमें सोंठ, अश्वगंधा भी होती है। यह प्रयोग मैंने 6 साल पहले किया था और अब जाकर यह सफल हुआ है। इस गुड़ का उपयोग आयुर्वेदिक दवाई की तरह भी किया जा सकता है, जैसे अजवाइन से तैयार गुड़ आपकी पाचन प्रक्रिया को अच्छा करता है। वहीं सौंफ से बना गुड़ आपकी भूख बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह का μलेवर्ड गुड़ आपकी डाइट में होना चाहिए और 20 ग्राम गुड़ रोज खाना चाहिए, जो सेहत के लिए अच्छा होता है।

300 लीटर गन्ने के रस से निकालते हैं 60 किलो गुड़

करेली के बटसेरा गांव से आए गुड़ विक्रेता कृष्ण कुमार ने बताया कि मैं सात साल पहले रासायनिक खेती किया करता था। इसके बाद जैविक खेती की शुरुआत की और आज 13 एकड़ में गन्ने की खेती है। उससे निकलने वाले रस से जैविक गुड़ तैयार कर रहा हूं। कृष्ण कुमार बताते हैं कि खाद और पेस्टीसाइड्स के रूप में गौमूत्र और गोबर की खाद का ही इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही गुड़ निकालने के लिए 300 लीटर की कढ़ाई का इस्तेमाल करते हैं। इसमें लगभग 60 किलो गुड़ निकाला जा सकता है। कृष्ण ने बताया कि वे अब इसी को बड़े स्केल पर बाहर सप्लाई करना चाहते हैं।

तेल और हल्दी लगाकर करते हैं दाल की पॉलिश

खमरिया झांसीघाट तहसील गोटेगांव जिला नरसिंहपुर से आए से आए जैविक अरहर दाल विक्रेता नर्मदा प्रसाद दुबे ‘नर्मदा स्वसहयता समूह’ चलाते हैं। उन्होंने बताया कि इस समय आत्मा परियोजना के तहत 50 किसानों के साथ काम कर रहे हैं। वे कहते हैं- हम लोग ग्रुप में काम करते हैं और किसी भी तरह से खेती करते समय कीट की समस्या होती है तो नीम और सीताफल की पत्ती से कीटनाशक तैयार कर उसका दाल की खेती में छिड़काव करते हैं। केमिकल का किसी भी तरह इस्तेमाल न करते हुए गोबर और गौमूत्र से ही खाद तैयार करते हैं। तेल और हल्दी लगाकर दाल की पॉलिश करते हैं।