Breaking News

‘इस बार पलाश के फूलने की चर्चा जंगल ने नहीं सुनी, न कोयल कुहकने की...’

 14 Jun 2021 01:34 AM

विश्व मैत्री मंच के राष्ट्रीय समूह द्वारा कोविड नियमों का पालन करते हुए जून काव्य महोत्सव का आयोजन किया गया। कोरोना की दूसरी लहर से दिवंगत हुए साहित्यकारों को यह गोष्ठी समर्पित की गई। काव्यगोष्ठी का शुभारंभ प्रार्थना गीत से किया गया, जिसमें संकट काल से सभी को उबारने की प्रार्थना ईश्वर से की गई। मां सरस्वती की वंदना के बाद समुद्र की व्यथा सुनाते हुए कवि अमर ने कहा, ‘महुआ के पेड़ से शुरू हुआ बचपन, समुद्र के किनारे आकर थम सा गया हैं, समुद्र की चिंघाड़ सुनकर, नहीं होता द्रवित, मेरा मन बहरा हो चुका हूं मैं भी...।’ कथाकार संतोष श्रीवास्तव ने सुंदर भाव संवेदना प्रकट की, ‘इस बार पलाश के फूलने की चर्चा, जंगल ने नहीं सुनी, न कोयल कुहकने की, न मंजरी महकने की हताश निराश जंगल खोज रहा है खुद को हैरान-परेशान कहीं वह रास्ता तो नहीं भटक गया, यहां तो शहर घुस आया है....।’आयोजन का संचालन रूपेंद्र राज ने किया।