घास की छाजन, गोबर और मिट्टी से बनते हैं भुंगा

 19 Feb 2021 12:57 AM

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा गुजरात के अर्ध-यायावर जनसमूह रबारी का पारंपरिक आवास संकुल भुंगा की जानकारी को आॅनलाइन प्रदर्शित किया गया है। घास फूस से ढके शंक्वाकर छत वाले अतिसाधारण परन्तु अत्यंत उपयोगी भुंगा कहलाने वाले आवास प्रकार रबारी गांवों की पहचान है। मिट्टी और गोबर से बने गोलाकार भुंगा में एक ही कमरा होता है। छत पेड़ों के तने व मोटी-मोटी शाखों के बीच पत्तों और घास की छाजन तैयार कर बनाई जाती है, जिसे मिट्टी और गोबर से छाप कर वाटरप्रूफ बनाया जाता है। गोबर और मिट्टी से ही बने ये कोठी और कोठले रबारी महिलाओं के सौंदर्य बोध एवं कला-कौशल के परिचायक हैं। कांच और मिट्टी से विविध आकृतियां उकेर कर महिलाएं अपनी रचनात्मक अभिरूचि को व्यक्त करती हैं।

देव कन्याओं से जुड़ी है उत्पत्ति की कहानी

निदेशक डॉ. प्रवीण मिश्र ने बताया कि मिथकों के अनुसार रबारियों की उत्पत्ति सम्बल नामक पशु पालक (ऊंट चराने वाले) और देव कन्याओं की चार पुत्रियों के राजपूतों के साथ विवाह करने और एक पृथक जाति समूह (रबारी) की स्थापना करने से हुई।

विवाह के लिए कढ़ाईयुक्त वस्तुएं स्वयं तैयार करती हैं रबारी

महिलाओं के सौंदर्य-बोध और कला-कौशल की अनुभूति उनके पहनावे सहित बुनाई और कशीदाकारी में होती है। एक रबारी बालिका लगभग छह वर्ष की आयु से कशीदाकला का अभ्यास करने लगती है और परिवार की वयस्क महिलाओं के मार्ग दर्शन में निपुणता प्राप्त कर लेती है तथा निजी उपयोग व घरेलू सजावट के साथ-साथ अपने विवाह के लिए विभिन्न कढ़ाईयुक्त वस्तुएं स्वयं तैयार करती है।