राजपूत समाज का पारंपरिक आवास है झोपा

 23 Apr 2021 12:34 AM

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा अपनी ऑनलाइन प्रदर्शनी में राजस्थान के जैसलमेर के नीम की ढाणी: झोपा राजपूत समुदाय का पारंपरिक आवास की जानकारी को ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला के तहत प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय के निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र ने बताया की राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य बस्ती (आबादी) और घर (धानियां) हमेशा कृषि भूमि के करीब स्थित होते हैं। घरों के निर्माण के लिए विभिन्न सामग्रियों का उपयोग उनकी स्थानीय उपलब्धता पर निर्भर करता है। आवास प्रकार की संरचना का जलवायु की परिस्थितियों से निकट संबंध होता है। राजस्थान मे गर्मी की अधिकता और सर्दियों में काफी ठंडक होती है, इसलिए काफी हद तक घरों के निर्माण में सामग्रियों के उपयोग जलवायु के अनुरूप ही करते है। इन आवासों को स्थानीय भाषा में ‘झोपा’ कहते हैं। इस गोलाकार झोपड़ी में छज्जे वाली छत होती है।

मुरठ घास से ढंका होता है घर

संग्रहालय के सहायक क्यूरेटर राकेश भट्ट ने बताया कि जैसलमेर से संग्रहित यह आवास राजस्थान के राजपूत समुदाय का है। छोटी-छोटी इकाइयों से मिलकर बने इस आवास संकुल में विला या बैठक कक्ष की स्थिति केंद्रीय होती है। इससे जुड़ा महिलाओं के लिए छोटा सा कक्ष 'कुड़' और एक अन्य अतिथि कक्ष 'चौराहा ओत्तारा' होता है। 'कोठा' के बाई ओर एक अन्य 'कुड़' रसोई और 'चौहारा' नामक कक्ष नव वधु के लिए निर्मित किया जाता है। पत्थर और मिट्टी से निर्मित दीवारों की छत स्थानीय रूप से उपलब्ध कैट नामक लकड़ी और मुरठ घास से ढका होता है।