जाना कठपुतली का इतिहास...फिर मंच पर सजीव हुई राजा अजमल की कहानी

 30 Nov 2020 01:06 AM

संस्कृति विभाग ने ‘गमक’ शृंखला अंतर्गत रविवार को आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा जनजातीय संग्रहालय में आयोजित देश में प्रचलित कठपुतली परंपरा का प्रदर्शन एवं व्याख्यान हुआ। इस ‘पुतुल समारोह’ में उदयपुर के विलास जानवे का पारंपरिक और आधुनिक पुतली कला पर व्याख्यान एवं दिलीप मासूम, भोपाल द्वारा धागा पुतली शैली में लोककथा की प्रस्तुति दी गई। प्रस्तुति की शुरुआत जानवे के व्याख्यान से हुई। उन्होंने अपने गुरु स्वर्गीय डा. अजय पॉल और स्वर्गीय पद्मश्री देवीलाल सामर का स्मरण करते हुए कहा- हमारे देश के कई राज्यों में पुतली कला की प्राचीन परंपरा रही है जहां धागा, छड़, छाया और दस्ताना पुतली देखने को मिलती है। धागा पुतली विलास जानवे ने बताया कि राजस्थान के भाट कलाकारों की कला है धागा पुतली, जिसमें वे अमरसिंह राठौर की कहानी को मंचित करते हैं। इनका कठपुतली का खेल तंबूडी में दिखाया जाता है। आज भी लोग पुरानी कथाओं को कठपुतली प्रदर्शन के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं और समय के साथ उनमें नवाचार करने का प्रयास करते हैं।

छाया पुतली

पारंपरिक छाया पुतली के विषय में बताते हुए विलास जानवे ने कहा कि तामिल नाडू और केरल में प्रस्तुति में चर्म की पुतलियों को बड़े परदे के पीछे से चलाते हैं। इसे पारम्परिक वाद्य चेंडा, एजुपारा और इलात्तालम के साथ संस्कृत और मलयालम में संवाद और गीतों के साथ पेश किया जाता है। इसके अलावा उन्होंने दस्ताना पुतली के बारे में भी लंबी चर्चा की ।

राजा अजमल की कथा

दूसरी प्रस्तुति दिलीप मासूम द्वारा धागा पुतली शैली में बावा रामदेव महाराज की लोककथा एकाग्र प्रस्तुति दी गई, जिसमे नौकोटी मारवाड़ के राजा अजमल की कथा को कठपुतली के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शन के मध्य कुछ राजस्थानी गीत- हो जी रे दीवाना हो जी रे मस्ताना, पल्लो लटके, बनी का मोरिया रे जट चौमासो लागे रे, आदि को कार्यक्रम में जोड़ा गया। बता दें कि दिलीप मासूम भाट का यह खानदानी पेशा है। कठपुतली कला इन्होंने अपने पिता स्व. चमनलाल भाट से सीखी और विगत 35 वर्षों से इस कला का प्रदर्शन करते आ रहे हैं।

विलास जानवे के बारे में

विलास जानवे एक पुतुल कलाकार और इस कला के विशेषज्ञ जानकार हैं। उनका बड़ा लंबा और गहरा अनुभव देश के कलाकारों के साथ रहा है। उन्होंने इस लंबे समय में अनेक कलाकारों को अपने से जोड़ा है और स्वयं भी उनसे जुड़े हैं। विलास जानवे को देश की कलाओं और कलाकारों की गहरी जानकारी भी है और वे स्वयं रंगमंच और माइम के कुशल और सिद्ध हस्त कलाकार हैं। विलास जानवे का सबसे महत्वपूर्ण कार्य देश के बहरूपिया कलाकारों को संयोजित करके एक मंच प्रदान करना रहा है और यह कार्य उन्होंने उदयपुर से लेकर दिल्ली तक किया है।