उपभोगवादी संस्कृति के पीछे छिन जाता है सुकून

 15 Oct 2020 12:50 AM  99

नीलबड़ स्थित चेतना टेरेस थिएटर में रंग माध्यम नाट्य संस्था द्वारा नाटक ‘आशिक दरोगाजी’ का मंचन हुआ। यह कहानी मुंशी प्रेमचंद की कहानी संग्रह ‘मानसरोवर’ से ली गई है। कहानी ऐसे चरित्र के लम्पटपन की है जो पुलिस विभाग में काम करते हुए अपनी मूल कार्यों की ओर स्थान न देकर शहर की लम्पटपन में फंस जाता है। रिश्वत खोरी के अलावा परस्त्री के चक्कर में फंसकर अपनी जान गंवाते- गंवाते बचता है और अंत में इस तरह के कामों से तौबा करता है। इससे ज्ञात होता है कि इंसानी कमजोरियों को किसी भी हाल में खुद के ऊपर सवार नहीं होने देना चाहिए और उपभोग की अतिवादिता से भी बचना चाहिए। निहायत व्यंग शैली में लिखी इस कहानी का नाट्य रूपांतंरण और निर्देशन करते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि कहानी अपनी पूरी बात कहे और उसके मनोरजंक तत्व कहीं भी शिथिल न हों एवं प्रासंगिकता भी बनी रहे। कहानी की प्रस्तुति एकल अभिनय की अभिकल्पना पर है, जिसमें अन्य किरदार को कठपुतली के द्वारा भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

डायरेक्टर्स कट

डायरेक्टर दिनेश नायर ने बताया प्रेमचंद की कई रचनाओं को पढ़ते हुए मुझे कहानी दरोगाजी पढ़ने को मिली ये कहानी अन्य कहानियों से अलग शहर की कहानी थी। मुंशी प्रेमचंद उर्दू का संस्कार लेकर हिंदी लेखन में आए थे और फिर हिंदी के महान लेखक बने। कहानी और उपन्यास दोनों में युगान्तरकारी परिवर्तन किए। जिससे भाषा इतनी सहज हो गइ की हर आम जन तक को कथन समझ में आने लगा। आम आदमी को उन्होनें अपनी रचनाओं का विषय बनाया और अपनी रचनाओं के माध्यम से उनकी समस्याओं को पुरजोर रूप से उठाया। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से जीवन की सच्चाई को उभारते हुए समाज में सांप्रदायिता, भ्रष्टाचार, जमीदारी, गरीबी एवं उपनिवेशवाद पर लिखा।