बूढ़ी काकी के जरिए दिखाया समय का फेर

 11 Jan 2021 01:31 AM

गमक श्रृंखला के अंतर्गत रवींद्र भवन में रविवार को मुंशी प्रेमचंद लिखित ‘बूढ़ी काकी’ नाटक का मंचन हुआ। प्रेमचंद अपने कहानियों में समाज के चरित्रों का ही चित्रण करते हैं। नाटक में बूढ़ी काकी को वक्त के रूप में परिभाषित करने की कोशिश की गई है, क्योंकि समय कभी एक जैसा नहीं रहता है। जीवन में सुख और दुख आता रहता है। नाटक में दिखाया गया कि बूढ़ी काकी पति के मरने के बाद अपना सारी संपत्ति बुद्धिराम को दान कर देती है। रूपा संपत्ति पाने के बाद बूढ़ी काकी को भूल ही जाती है यहां तक कि उसे खाने तक के लिए नहीं पूछती है। अपने बेटे के तिलक जैसे शुभ मुहूर्त के अवसर पर भी उसे भोज से दूर रखते हैं। भोज में बहुत लोग शामिल होते हैं, किसी के पत्तल पर पूड़ी, कचौड़ी , सब्जी-दही जैसे व्यंजन पड़ा है, कोई खा-खाकर डकार ले रहा है तो कोई पत्तल में एक भी पूरी छोड़ना नहीं चाहता है। वहीं बूढ़ी काकी भूख से तड़प रही होती है। हवा में उड़ रही व्यजंन के महक को सूंघकर वह भोज की कल्पना करती है, और समय के सच के सामने झुक जाती है। वह भोजन करने के बारे में सोचती है, लेकिन रूपा से डरती है। रूपा उसे किसी से मिलने या किसी के सामने आने पर भी फटकार लगाती रहती है।