कविताएं पाठ्यक्रम से गायब हो गई हैं, जबकि इन्हें पढ़ाया जाना चाहिए:बादल

 06 Apr 2021 12:47 AM

दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय में उपस्थित श्रोताओं ने माखनलाल चतुर्वेदी की आवाज में उनकी अमर रचना ‘पुष्प की अभिलाषा  ’ सुनकर गौरव की अनुभूति की। इस कविता के लेखन का शताब्दी वर्ष आरम्भ होने के पर संग्रहालय ने यह आयोजन किया। समारोह के मुख्य अतिथि राजेश बादल ने कहा कि 100 वर्ष बाद भी यह रचना हमारे हृदय में धड़क रही है तो निश्चित ही यह रचना कालजयी है। हम अपने पूर्वजों के संघर्षों को स्मृतियों को नहीं सहेज पा रहे हैं और देश को लेकर त्याग समर्पण का भाव पहले जैसा अब नहीं रहा। देश प्रेम का संस्कार हम बच्चों में नहीं दे पा रहे हैं ,पहले वतन के लेकर जो प्रेम था वह गायब होता जा रहा है। यह कविताएं आज पाठ्यक्रम से क्यों गायब हो गईं हैं, जबकि इन्हें पढ़ाया जाना अनिवार्य होना चाहिए। 1922 में लिखी गई थी ‘पुष्प की अभिलाषा’ विशिष्ट अतिथि अजय कुमार तिवारी माखनलाल चतुर्वेदी के नाती ने अपने बचपन के संस्मरण साझा करते हुए बताया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री भगवंत राव मंडलोई जब दादा से मिलने आए तो वे आम आदमी की तरह बाहर तख्त पर बैठे दादा का इंतजार करते रहे। निदेशक राजुरकर राज ने इस कविता की प्रष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया कि इस कविता के रचनाकाल को लेकर भ्रम की स्थिति है, जो माखनलालजी स्वयं स्पष्ट करते हैं कि यह कविता मार्च 1922 में लिखी गई है। उन्होंने कहा कि यह शताब्दी पर्व दुष्यंत संग्रहालय पूरे वर्ष आयोजित करेगा। इस मौके पर स्वागत उद्बोधन संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने दिया तथा अतिथियों का स्वागत अशोक निर्मल एवं घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ ने किया।