सुर ही संगीत के प्राण और आत्मा

 22 Nov 2020 01:22 AM

संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आयोजित ‘गमक’ श्रृंखला के अंतर्गत अनुजा झोंकरकर द्वारा ‘स्वर सरिता’ विषय पर एकाग्र व्याख्यान एवं गायन की प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम की शुरुआत अनुजा झोकरकर के व्याख्यान से हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि संगीत में शास्त्रीय, उपशास्त्रीय एवं सुगम संगीत आदि तीनों विधाएं बहुत ही लोकप्रिय और प्रचलित हैं। नाद ब्रम्ह से संगीत सृष्टि का निर्माण हुआ है। सुरों का अपना महत्व होता है। सुर ही संगीत का प्राण व आत्मा है। इसलिए सुरीला संगीत हमेशा लोकप्रिय होता है। हमारे संगीत की शुरुआत लोक संगीत से हुई है। संगीत के चार सुरों से संगीत सृष्टि का निर्माण हुआ है। शास्त्रीय संगीत की विधाओं में पहले प्रबंध गायन गाया जाता है। उसके बाद ध्रुपद, धमार, अष्टपदी, तराना और सबसे बाद में खयाल गायन की परंपरा शुरू हुई और अभी तक जारी है। ध्रुपद को भी आजकल बहुत महत्व दिया जा रहा है और यह प्राचीन कला पुन: जीवित हो उठी है।