देश की एकमात्र नदी जो उल्टी दिशा में बहती है, गंगा से भी माना जाता है पवित्र

 06 Mar 2021 01:45 PM

जबलुपर. देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जिस नर्मदा नदी की महाआरती में शामिल हो रहे हैं, उस नर्मदा नदी को लेकर प्राचीन काल से तरह-तरह की मान्यताएं हैं। कुछ तथ्य तो ऐसे हैं जो शायद आपने पहले नहीं सुने होंगे। यह एकमात्र ऐसी नदी है जिसका पुराण है। यह एकमात्र ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि नर्मदा के तटों पर कठोर तप करते आ रहे हैं। आज हम आपको बताएंगे नर्मदा नदी से जुड़ी कुछ ऐसी ही मान्यताएं।

भगवान शिव के पसीने की बूंद हैं नर्मदा

जबलपुर से लगभग 285 किलोमीटर दूर मैकल पर्वत के अमरकंटक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई थी। मध्यप्रदेश की लाइफ लाइन कही जाने वाली इस नदी को 'रेवा' भी कहा जाता है। नर्मदा नदी का स्वयं एक पुराण है, जिसमें प्रचलित मान्यताओं का वर्णन है। पुराणों में बताया गया है कि नर्मदा का जन्म एक 12 वर्ष की कन्या के रूप में हुआ था। समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव के पसीने की एक बूंद धरती पर गिरी, जिससे मां नर्मदा प्रकट हो गईं। इसी वजह से इन्हें 'शिवसुता' भी कहा जाता है।

देश में एकमात्र नदी जो उल्टी दिशा में बहती है

नर्मदा नदी से जुड़ा सबसे रोचक तथ्य यह है कि यह विपरीत दिशा में बहती है। गंगा सहित अन्य नदियां जहां पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, वहीं नर्मदा नदी बंगाल की खाड़ी की जगह अरब सागर में जाकर मिलती है। मान्यता है कि एक बार क्रोध में आकर इन्होंने अपनी दिशा बदल ली थी और चिरकाल तक अकेले ही बहने का निर्णय लिया। इनके इस अखंड निर्णय की वजह से ही इन्हें चिरकुंआरी कहा जाता है।

प्रलयकाल में भी नहीं होगा अंत

पुरणों में उल्लेख है कि भगवान शिव ने अनंतकाल तक मां नर्मदा को संसार में रहने का वरदान दिया था। ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने वरदान देते हुए कहा था कि प्रलयकाल में भी तुम्हारा अंत नहीं होगा। अपने निर्मल जल से तुम युगों-युगों तक इस समस्त संसार का कल्याण करोगी।

एक छोटी से धारा और विशाल रूप

जबलुपर से 285 किलोमीटर दूर अमरकंटक मां नर्मदा का उद्गम स्थल है। यहां ये नर्मदा एक एक छोटी-सी धार से प्रारंभ हुई हैं और आगे बढ़कर विशाल रूप धारण लिया।

गंगा से अधिक पवित्र माना गया है

ऐसी पुरातन मान्यता है कि गंगा स्वयं प्रत्येक साल नर्मदा से भेंट एवं स्नान करने आती हैं। मां नर्मदा को मां गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है कहा जाता है कि इसी वजह से गंगा हर साल स्वयं को पवित्र करने नर्मदा के पास पहुंचती हैं। यह दिन गंगा दशहरा का माना जाता है। जिस प्रकार गंगा में स्नान का पुण्य है उसी प्रकार नर्मदा के दर्शन मात्र से मनुष्य के कष्टों का अंत हो जाता है।

यहां से निकले पत्थर होते हैं प्राणप्रतिष्ठित

अन्य नदियों से विपरीत नर्मदा से निकले हुए पत्थरों को शिव का रूप माना जाता है। ये स्वयं प्राणप्रतिष्ठित होते हैं अर्थात् नर्मदा के पत्थरों को प्राण प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता नहीं होती। इसी कारण देश में ही नहीं विदेशों में भी नर्मदा से निकले हुए पत्थरों की शिवलिंग के रूप में सर्वाधिक मान्यता है।