संकट काल में खाकी का नया रोल, चौतरफा इंसानियत की मिसाल

 04 May 2021 12:24 AM

जबलपुर । कोरोना संकट काल में शहर की पूरी सुरक्षा व्यवस्थाओं से लेकर लॉक डाउन करवाने, अनावश्यक आने-जाने वालों पर सख्ती दिखाती पुलिस का इस दौर में मानवीय चेहरा भी सामने आया है। अस्पतालों में आक्सीजन सिलेंडर खुद ढोकर पहुंचाने से जहां कई लोगों की जानें बची हैं,तो दूर-दूर से आकर प्लाज्मा, ब्लड डोनेशन में भी पुलिस आगे है। इसके अलावा अपने हिस्से का भोजन तक गरीबों को खिला रहे हैं।

केस 1  23 अप्रैल को गैलेक्सी हॉस्पिटल में आक्सीजन खत्म होने पर तड़फते मरीजों के लिए पुलिस सीएसपी दीपक मिश्रा के मार्गदर्शन में खुद आक्सीजन लेकर पहुंची।यहां पर 5 म रीजों की जान तो चली गई मगर बाकी की जान बचा ली गई। 50 मिनट के आॅपरेशन में 65 लोगों की जान सुरक्षित कर ली गई।

केस 2 28 अप्रैल की देर रात धनवंतरी नगर स्थित आरोग्यम अस्पताल में आक्सीजन खत्म हो जाने पर पुलिस ने संजीवनी नगर पुलिस को समय रहते सूचना मिलने पर रात 2.30 बजे आधे घंटे के अंदर आॅक्सीजन की खेप पहुंचाई। यहां पर 7 मरीज आॅक्सीजन के सहारे थे और आक्सीजन आधे घंटे की बची थी।

केस 3 ओमती थाने में पदस्थ आरक्षकों ने खुद को मिलने वाला खाना गरीबों में बांट दिया। सीएसपी दीपक मिश्रा कहते हैं कि यह आरक्षकों ने भूखे से बिलखते लोगों को देखकर निर्णय लिया,खुद भूखे रहे ।

केस 4 27 अप्रैल को ही कैंट के थाना प्रभारी विजय तिवारी और आरक्षक रामकृष्ण शर्मा ने सतना निवासी महिला और छिंदवाड़ा के पुरुष मरीज को प्लाज्मा डोनेट कर उसकी जान बचाई।

केस 5 27 अप्रैल को गोहलपुर सीएसपी अखिलेश गौर ने अपना एक माह का वेतन राहत कोष में दान कर दिया। यह पे्ररक पहल हर किसी को अच्छी लगी।

केस 6 चंडालभाटा स्थित न्यू ट्रामा हॉस्पिटल में भी रात 2.30 बजे एकाएक आक्सीजन के खत्म होने से यहां भर्ती आक्सीजन सपोर्ट के मरीजों की जान पर बन आई। समय रहते सूचना मिलने पर पुलिस ने 24 सिलेंडर पहुंचाए।

केस 7 18 अप्रैल को तिलवारा थाना अंतर्गत शास्त्री नगर में देर रात एक मरीज को दिल का दौरा पड़ा। कोई साधन न होने पर परेशान परिजनों ने एफआरवी को फोन लगाया जो मौके पर पहुंचकर मरीज 52 वर्षीय अनूप कुमार दुबे को अस्पताल ले गई।

केस 8 एसएएफ रांझी में आईजी आफिस में पदस्थ आरक्षक प्रभांशु सिंह मैहर में थे उन्हें पता चला कि किसी मासूम को बी निगेटिव रक्त की जरूरत है अन्यथा उसकी जान जा सकती है। प्रभांशु 200 किमी का सफर तय कर मासूम को रक्तदान कर उसकी जान बचा ली। बच्चा थैलेसीमिया का शिकार था।