चैत्र नवरात्र आज से: जानें मां शैलपुत्री की पूजा के शुभ मुहूर्त, पढ़ें मां शैलपुत्री से जुड़ी पौराणिक कथा

 13 Apr 2021 11:45 AM

भोपाल। त्याग, तप, साधना और संयम का महापर्व चैत्र नवरात्र आज से शुरू हो गई है। नवरात्र के पहले दिन विधिविधान से घट स्थापना के साथ प्रथम आदिशक्ति मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप का भव्य शृंगार, पूजन किया जाता है। घट स्थापना के लिए आज दिन भर में 4 शुभ मुहूर्त हैं। घरों में नौ दिनों तक श्रद्धापूर्वक मां भगवती की पूजा-अर्चना की जाएगी। कोरोना के चलते इस बार कई राज्यों में मंदिर बंद हैं। भक्त घर पर ही जप, तप, यज्ञ, हवन, अनुष्ठान करके महामारी से मुक्ति की कामना कर रहे हैं। नवरात्र का समापन 22 अप्रैल को होगा। 

मां शैलपुत्री की पूजा के शुभ मुहूर्त
अमृतसिद्धि योग - 13 अप्रैल की सुबह 06 बजकर 11 मिनट से दोपहर 02 बजकर 19 मिनट तक। 
सर्वार्थसिद्धि योग - 13 अप्रैल की सुबह 06 बजकर 11 मिनट से 13 अप्रैल की दोपहर 02 बजकर 19 मिनट तक।
अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12 बजकर 02 मिनट से  दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक।
अमृत काल - सुबह 06 बजकर 15 मिनट से 08 बजकर 03 मिनट तक।
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04 बजकर 35 मिनट से सुबह 05 बजकर 23 मिनट तक।

इस बार पूरे नौ दिन के नवरात्र
इस बार नवरात्र में तिथियों की घटबढ़ नहीं होने से देवी पूजा के लिए पूरे नौ दिन मिलेंगे। ये शुभ संयोग है। साथ ही अश्विनी नक्षत्र में नवरात्र शुरू होने पर देवी आराधना से रोग नाश का विशेष फल मिलेगा। इस नवरात्र की शुरूआत 4 बड़े शुभ योगों में हो रही है। जिनका शुभ प्रभाव देशभर में रहेगा। इस बार भारती, हर्ष, स्वार्थसिद्धी और अमृतसिद्धि योग का असर नवरात्र की अष्टमी तिथि से देखने को मिल सकता है। शुभ योगों के प्रभाव से बीमारी और डर का माहौल खत्म हो जाएगा। साथ ही लोगों की इनकम बढ़ेगी। देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इस बार नवरात्र में कोई भी तिथि क्षय नहीं होना भी शुभ संकेत है।

घटस्थापना के लिए पूजन सामग्री
घटस्थापना के लिए कलश, सात तरह के अनाज, पवित्र स्थान की मिट्टी, गंगाजल, कलावा, आम के पत्ते, नारियल, सुपारी, अक्षत, फूल, फूलमाला, लाल कपड़ा, मिठाई, सिंदूर, दूर्वा, कपूर, हल्दी, घी, दूध आदि वस्तुएं जरूरी हैं। हालांकि कई जगह पर लॉकडाउन के कारण पूजन सामग्री नहीं मिल पा रही है। 

सात्विक आहार, विहार, व्यवहार से बढ़ेगी रोग प्रतिरोधक क्षमता
नवरात्र में हवन, पूजन के साथ व्रत, उपवास का विशिष्ट महत्व है। इस दौरान संयमित जीवन शैली  रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि में भी सहायक होगा। वरिष्ठ आयुर्वेद व योग चिकित्सक डॉ. टीएन पांडेय ने बताया कि वासंतिक नवरात्र ऋतु परिवर्तन का संधिकाल होता है। इस दौरान विषाणु जनित बीमारियों का प्रजनन अधिक होता है। नवरात्र में व्रत रहने से आत्मिक, शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है। व्रत में तामसिक चीजों का त्याग कर देते हैं। आदि शक्ति के निमित्त भोजन त्याग की भावना आत्मबल प्रदान करती है। सुपाच्य आहार, विहार, व्यवहार और विचार से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। 

जानिए कैसे करें कलश स्थापना के बाद चौकी की स्थापना
1. सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी को गंगाजल या स्वच्छ जल से धोकर पवित्र कर लें।
2. अब इसे साफ कपड़े से पोछकर लाल कपड़ा बिछाएं।
3. चौकी के दाएं ओर कलश रखें।
4. चौकी पर मां दुर्गा की फोटो या प्रतिमा स्थापित करें।
5. माता रानी को लाल रंग की चुनरी ओढ़ाएं।
6. धूप-दीपक आदि जलाकर मां दुर्गा की पूजा करें।
7. नौ दिनों तक जलने वाली अखंड ज्योत माता रानी के सामने जलाएं।
8. देवी मां को तिलक लगाएं।
9. मां दुर्गा को चूड़ी, वस्त्र, सिंदूर, कुमकुम, पुष्प, हल्दी, रोली, सुहान का सामान अर्पित करें।
10. मां दुर्गा को इत्र, फल और मिठाई अर्पित करें।
11. अब दुर्गा सप्तशती के पाठ देवी मां के स्तोत्र, सहस्रनाम आदि का पाठ करें।
12. मां दुर्गा की आरती उतारें।
13. अब वेदी पर बोए अनाज पर जल छिड़कें।
14. नवरात्रि के नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करें। जौ पात्र में जल का छिड़काव करते रहें।  

पूजा विधि
पूजा शुरू करने से पहले खुद पर गंगाजल छिड़कें, तिलक लगाएं और दीपक जलाएं।
नवरात्र में हर दिन सबसे पहले भगवान गणेश और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए।
इसके बाद कलश और देवी दुर्गा की पूजा करें।
अबीर, गुलाल, कुमकुम, चावल, हल्दी, मेहंदी, चंदन, मौली, पंचामृत और श्रद्धानुसार कई चीजों से पूजा की जा सकती है।
इसके बाद आरती करें और घर में बने सात्विक भोजन और मौसमी फल का नैवेद्य लगाकर घर में प्रसाद बांट लें।

मां शैलपुत्री का कैसा है स्वरूप
मां शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल है। यह देवी वृषभ पर विराजमान हैं, जो पूरे हिमालय पर राज करती है। मान्यता है कि नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की विधि-विधान से पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

मां शैलपुत्री का प्रसाद
मां शैलपुत्री के चरणों में गाय का घी अर्पित करने से भक्तों को आरोग्यता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

मां शैलपुत्री मंत्र
वन्दे वाझ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

पढ़ें मां शैलपुत्री से जुड़ी पौराणिक कथा
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इनका वाहन वृषभ (बैल) है। शैल शब्द का अर्थ होता है पर्वत। शैलपुत्री को हिमालय पर्वत की बेटी कहा जाता है। इसके पीछे की कथा यह है कि एक बार प्रजापति दक्ष (सती के पिता) ने यज्ञ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया। दक्ष ने भगवान शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा। ऐसे में सती ने यज्ञ में जाने की बात कही तो भगवान शिव उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण जाना ठीक नहीं लेकिन जब वे नहीं मानीं तो शिव ने उन्हें इजाजत दे दी।

जब सती पिता के यहां पहुंची तो उन्हें बिन बुलाए मेहमान वाला व्यवहार ही झेलना पड़ा। उनकी माता के अतिरिक्त किसी ने उनसे प्यार से बात नहीं की। उनकी बहनें उनका उपहास उड़ाती रहीं। इस तरह का कठोर व्यवहार और अपने पति का अपमान सुनकर वे क्रुद्ध हो गयीं। क्षोभ, ग्लानि और क्रोध में उन्होंने खुद को यज्ञ अग्नि में भस्म कर लिया। यह समाचार सुन भगवान शिव ने अपने गुणों को भेजकर दक्ष का यज्ञ पूरी तरह से विध्वंस करा दिया।  अगले जन्म में सती ने हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है।