बुंदेलखंड के एरच में मनी थी पहली होली, यहीं प्रकट हुए थे नरसिंह भगवान, बचाया था प्रहलाद को

 28 Mar 2021 03:32 PM

झांसी। होली हम सब खेलते हैं, इसकी पौराणिक कथा भी हम सबको पता है, लेकिन होली की शुरुआत कहां हुई थी इसकी जानकारी कम ही बताई जाती है। तो आइए इस होली पर जानें कहां से शुरू हुई थी होली। 
होली का पौराणिक इतिहास बुंदेलखंड से जुड़ा हुआ है। वर्तमान झांसी मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर बामौर ब्लॉक में स्थित एरच धाम को होली का जन्मस्थल माना जाता है। बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष इतिहासविद हरगोविन्द कुशवाहा के अनुसार खुदाई के दौरान एरच में 250 फुट नीचे मिली पत्थर की होलिका और उसकी गोद में भक्त प्रहलाद की मूर्ति इस बात का प्रमाण है कि यह वही एरिकेच्छ है, जो राक्षसराज हिरण्यकश्यप की राजधानी थी। श्रीमद् भागवत पुराण में सतयुग में भक्त प्रहलाद का प्रसंग आता है जिसमें बताया गया है कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप दो राक्षस भाई थे, जिनकी राजधानी एरिकेच्छ थी जो अब बदल कर एरच हो गया।
श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद हुआ, जो विष्णु भक्त था। तरह-तरह की यातनाएं देने के बाद उसने प्रहलाद को मारने के लिए डिकौली या डिकांचल पर्वत से नीचे बेतवा नदी के गहरे पानी में फिकवा दिया था। कुशवाहा के अनुसार भागवत कथा में जिस डीकांचल या डिकौली पर्वत का जिक्र है वह एरच में बेतवा के किनारे मौजूद है। अंग्रेजों ने झांसी के गजेटियर में भी इसका जिक्र किया है। गजेटियर के 339 पेज पर एरच और डिकौली का जिक्र है। एरच में मिली होलिका और प्रहलाद समेत नरसिंह की मूर्तियां इस बात को प्रमाणित करती हैं कि होली इसी जगह से शुरू हुई थी।  
कुशवाहा के अनुसार प्रहलाद को मारने के लिए हिरण्यकश्यप ने जिस महल में तलवार उठायी थी वह महल वर्तमान के खमा गांव में था। खमा गांव डिकौली पर्वत के पास ही एरच में है। इसी स्थान पर होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी उसी स्थान पर प्रहलाद और होलिका की मूर्ति स्थित है।
यहीं प्रकट हुए थे नरसिंह भगवान :
पौराणिक कथा के अनुसार गहरे पानी में फेंकने के बाद भी जब प्रहलाद बच गया तो हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को अपने पुत्र की हत्या का काम सौंपा। होलिका को वरदान था कि वह जलती आग में बैठ जाएगी तो भी उसे आग की लपटें छू नहीं सकती थी। होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ गयी। ईश्वर कृपा से जलती आग के बीच प्रहलाद को तो कुछ नहीं हुआ, बल्कि होलिका ही जलकर भस्म हो गयी। इसके बाद हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने के लिए तलवार उठाई तो तलवार एक खंभे मे जा लगी और नरसिंह रुप में भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया।
अपने राजा का वध होते देख हजारों राक्षसों उत्पात मचाना शुरू कर दिया और नरसिंह भगवान को घेर लिया। नरसिंह भगवान ने उन सभी का भी वध कर दिया। तब से इस राक्षसी उपद्रव को कीचड़ की होली के रूप में बुंदेलखंड में मनाया जाता है। हिरण्यकश्यप के वध के बाद जब भक्त प्रहलाद का राज्याभिषेक कर दिया गया तो उत्पात थम गया और फिर खुशी में रंगों और फूलों की होली मनाई गई इसीलिए दूज पर रंगों की होली होती है जो रंगपंचमी तक चलती है।