पोंगल पर्व आज से शुरू: कैसे खेलते हैं जल्लीकट्टू, सांड को काबू करने से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव

 14 Jan 2021 04:10 PM

नई दिल्ली। दक्षिण भारत का प्रसिद्ध त्योहार पोंगल की आज से शुरुआत हो चुकी है। चार दिन तक चलने वाले इस पर्व को तमिलनाडु के कई इलाकों में धूमधाम से मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जल्लीकट्टू खेल में जो व्यक्ति सांडों पर काबू पा लेता है उसपर भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और कृपा करते हैं। जल्लीकट्टू के लिए सांडों को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी जाती है।

कैसे खेलते हैं जल्लीकट्टू
सांडों को काबू में करने का खेल है जल्लीकट्टू। इस खेल में विशेष तरीके से प्रशिक्षित सांडों को एक बंद स्थान से छोड़ा जाता है। बाहर खेलने वालों की फौज मुस्तैद खड़ी रहती है। बेरिकेटिंग से बाहर बड़ी संख्या में दर्शक खेल का आनंद उठाने के लिए इकट्ठा होते हैं। जैसे ही सांड छोड़ा जाता है, वह भागते हुए बाहर निकलता है, लोग उसे पकड़ने के लिए टूट पड़ते हैं। असली काम सांड के कूबड़ को पकड़कर उसे रोकना और फिर सींग में कपड़े से बंधे सिक्के को निकालना होता है। लेकिन बिगड़ैल और गुस्सैल सांड को काबू में करना आसान नहीं होता। अधिकांश को असफलता हाथ लगती है और कई लोग इस कोशिश में चोटिल भी हो जाते हैं। इस कवायद में कइयों की जान भी चली जाती है।  लेकिन परंपरा और रोमांच से जुड़े इस खेल के प्रति खिलाड़ियों और दर्शकों का जुनून गजब का होता है। जो विजयी होते हैं उनको ईनाम मिलता है। 

बुलफाइटिंग से बहुत अलग है जल्लीकट्टू
कई लोग जल्लीकट्टू की तुलना स्पेन की बुलफाइटिंग से करते हैं। लेकिन यह खेल स्पेन के खेल से काफी भिन्न है। इसमें बैलों को मारा नहीं जाता और ना बैल को काबू करने वाले युवक किसी तरह के अस्त्र-शस्त्र का इस्तेमाल करते हैं। हां बैलों को गुस्सैल बनाने के लिए शराब पिलाने की बातें सामने आती हैं। उल्लेखनीय है कि, प्राचीन तमिल समाज शिवभक्त रहा है, सांड को शिव की सवारी नंदी के तौर पर पूजा जाता है। तमिल समाज की पौराणिक मान्यता के अनुसार, सांड को काबू में करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं।