जदयू ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और महासचिव पवन वर्मा को किया निष्कासित

जदयू ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और महासचिव पवन वर्मा को किया निष्कासित

पटना। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ लगातार बयान दे रहे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पवन वर्मा एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को आज जदयू से निष्कासित कर दिया गया। जदयू के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव के. सी. त्यागी ने यहां बताया कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ लगातार बयान दे रहे राष्ट्रीय महासचिव एवं भारतीय विदेश सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी पवन वर्मा तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि इससे संबंधित पत्र भी जारी कर दिया गया है।

 त्यागी ने कहा कि पार्टी का अनुशासन, पार्टी का निर्णय एवं पार्टी नेतृत्व के प्रति वफादारी ही दल का मूल मंत्र होता है। उन्होंने कहा कि पिछले कई महीनों से दल के अंदर पदाधिकारी रहते हुए श्री प्रशांत किशोर ने कई विवादास्पद वक्तव्य दिए, जो दल के निर्णय के विरुद्ध एवं उनकी स्वेच्छाचारिता का परिचायक है। श्री किशोर के पार्टी में आने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कुमार ने सम्मानित किया, जिसका इस्तेमाल वे अपनी स्वेच्छाचारिता के रूप में करते रहे। प्रधान महासचिव ने कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने श्री किशोर के स्वेच्छाचारी बयानों को दरकिनार करते हुए कहा, ‘‘उनकी इच्छा पर निर्भर है कि पार्टी में रहें या नहीं रहना है तो जहां, इच्छा हो जाने के लिए स्वतंत्र हैं।’’ इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप श्री किशोर ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के विरुद्ध अपमानजनक शब्दोें का इस्तेमाल किया, जो अपने आप में स्वेच्छाचारिता है। श्री किशोर और ज्यादा नहीं गिरे, इसके लिए आवश्यक है कि वे पार्टी से मुक्त हों। श्री त्यागी ने कहा कि श्री पवन वर्मा दल में आए और उन्हें जितना सम्मान मिलना चाहिए था उससे अधिक सम्मान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कुमार ने उन्हें दिया। मिले सम्मान को श्री वर्मा ने संजोने और पार्टी के प्रति समर्पित रहने की बजाय इसे पार्टी की मजबूरी समझा। पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखकर इसे सार्वजनिक करना, उसमें निजी बातों का उल्लेख करना और उसे सार्वजनिक करना यह दर्शाता है कि दल का अनुशासन उन्हें स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी सामूहिक जिम्मेवारी से चलती है लेकिन कुछ लोग इस भ्रम के शिकार हो जाते हैं कि पार्टी उनके विचारों से चलती है। 

जदयू के प्रधान महासचिव ने कहा कि जदयू कार्यकर्ताओें की पार्टी है। अपने सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी है, सामूहिक जिम्मेवारी से चलने वाली पार्टी है। उन्होंने कहा कि श्री किशोर एवं श्री वर्मा के आचरण से स्पष्ट है कि वे दल के अनुशासन के बंधन में नहीं रहना चाहते बल्कि मुक्त होना चाहते हैं। श्री त्यागी ने कहा कि जदयू संविधान के नियम की धारा 21 के अनुशासन संबंधी नियमों के खंड चार (क) के अनुसार पार्टी के कार्यक्रम तथा निर्णय के विरुद्ध कार्य करना तथा प्रचार करना अनुशासन भंग करना माना जाता है। उन्होंने कहा कि जदयू श्री किशोर एवं श्री वर्मा को तत्काल प्रभाव से प्राथमिक सदस्यता समेत अन्य सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करता है। गौरतलब है कि जदयू के नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) को लोकसभा में समर्थन दिए जाने के विरोध में श्री किशोर और श्री वर्मा ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इसके बाद से दोनों नेता लगातार पार्टी के निर्णय के खिलाफ हमलावर बने रहे। श्री किशोर ने जदयू के समर्थन के निर्णय को लेकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए पिछले वर्ष 09 दिसंबर को कहा था, ‘‘धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव करने वाला नागरिकता संशोधन विधेयक पर जदयू के समर्थन से मैं दुखी हूं। जदयू के द्वारा इस विधेयक का समर्थन पार्टी के संविधान से मेल नहीं खाता है, जहां पहले ही पन्ने पर धर्मनिरपेक्षता शब्द तीन बार लिखा हुआ है। नागरिकता संशोधन विधेयक पर समर्थन पार्टी नेतृत्व के विचारधारा से मेल नहीं खाता है, जो कि महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित है।’’ वहीं, श्री वर्मा ने कहा था, ‘‘मैं श्री नीतीश कुमार से अपील करता हूं कि वह राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक को समर्थन देने पर दोबारा विचार करें। यह विधेयक असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और देश की एकता एवं सौहार्द के खिलाफ है। साथ ही जदयू के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के भी खिलाफ है। आज गांधीजी होते तो इसे पूरी तरह ठुकरा देते।’’

इसके बाद से किशोर और  वर्मा जदयू नेताओं के निशाने पर आ गए। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने इस विधेयक का लोकसभा में पार्टी के समर्थन से श्री किशोर और श्री वर्मा की नाराजगी पर 11 दिसंबर को कहा कि इस विधेयक पर जदयू का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। पार्टी लोकसभा की तरह राज्यसभा में भी विधेयक का समर्थन करेगी। उन्होंने कहा कि जब पार्टी का रुख साफ है तो किसी भी पद पर बैठे लोगों के बयान का कोई अर्थ नहीं है। महत्वपूर्ण वही है जो लोकसभा में सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा है। पार्टी लाइन से अलग हटकर बयानबाजी करने वालों के ये निजी विचार हो सकते हैं। इससे पार्टी को कोई लेनादेना नहीं है। इस पर श्री किशोर ने पलटवार करते हुए कहा, ‘‘नागरिकता संशोधन विधेयक का समर्थन करने से पहले जदयू नेतृत्व को उन लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिन्होंने वर्ष 2015 में जदयू पर भरोसा जताया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी और उसके प्रबंधकों के पास जीत के बहुत अधिक रास्ते नहीं बचे थे।’’  किशोर के इस बयान पर जदयू नेता एवं बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री नीरज कुमार ने 12 दिसंबर को कहा, ‘‘नीतीश कुमार विचार और कर्म से धर्मनिरपेक्ष हैं, दर्पण की तरह साफ है। काम ही उनकी पहचान है। भ्रम न पालें, वोट के गणित को देखें। नीतीश जी के नेतृत्व एवं जनादेश से स्पष्ट हो जायेगा। गौर करें 2015 विधानसभा चुनाव (64.17 लाख) की तुलना में 2019 लोकसभा चुनाव (89.02 लाख) में जद यू के वोटों में 39 प्रतिशत (24.85 लाख) का इजाफा हुआ है। ज्ञानवर्द्धन करें..।’’ वहीं, जदयू के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने श्री किशोर का नाम लिए बगैर कहा कि इस विधेयक में कोई ऐसा प्रावधान नहीं किया गया है, जिससे अल्पसंख्यकों का अहित हो। इसके मद्देनजर जब पार्टी का रुख स्पष्ट था तो किसी की बयानबाजी को कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के राज्यों एवं अल्पसंख्यकों को लेकर कायम संशय दूर होने के बाद ही जदयू ने इस विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में समर्थन दिया है। इस बीच राजनीतिक गलियारे में चर्चा होने लगी कि श्री किशोर की जदयू के युवा नेताओं पर अच्छी पकड़ है। इस मुद्दे को लेकर पार्टी के कुछ मुस्लिम विधायक और कुछ सांसद भी नाराज हैं और इसका फायदा उठाकर श्री किशोर जदयू को तोड़कर अपनी एक नई पार्टी भी बना सकते हैं। जदयू के वरिष्ठ नेता आरसीपी सिंह ने तो यहां तक कहा दिया, ‘‘कौन हैं प्रशांत किशोर। अभी वह किसके लिए काम कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि वह अनुकम्पा पर जदयू में आये हैं। हमारे नेता ने उन्हें इतना बड़ा सम्मान दिया लेकिन वह क्या कर रहे हैं देखिए।’’ उन्होंने श्री किशोर के खिलाफ कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर कहा कि पार्टी उनपर कोई कार्रवाई नहीं करेगी। वह पार्टी में कुछ भी नहीं हैं।

सीएए-एनआरसी के विरोध को लेकर श्री किशोर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता एवं बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के निशाने पर भी आए। श्री मोदी ने कहा, ‘‘वर्ष 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाना तय है। सीटों के तालमेल का निर्णय दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व समय पर करेगा। कोई समस्या नहीं है। लेकिन, जो लोग किसी विचारधारा के तहत नहीं बल्कि चुनावी डाटा जुटाने और नारे गढ़ने वाली कंपनी चलाते हुए राजनीति में आ गए, वे गठबंधन धर्म के विरुद्ध बयानबाजी कर विरोधी गठबंधन को फायदा पहुंचाने में लगे हैं। एक लाभकारी धंधे में लगा व्यक्ति पहले अपनी सेवाओं के लिए बाजार तैयार करने में लगता है, देशहित की चिंता बाद में करता है।’’ इसपर श्री किशोर ने अगले ही दिन पलटवार किया और कहा, ‘‘बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नेतृत्व और जदयू की सबसे बड़े दल की भूमिका बिहार की जनता ने तय किया है, किसी दूसरी पार्टी के नेता या शीर्ष नेतृत्व ने नहीं।’’ वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी परिस्थितिवश उप मुख्यमंत्री बनने वाले सुशील कुमार मोदी से राजनीतिक मर्यादा और विचारधारा पर व्याख्यान सुनना सुखद अनुभव है।’’ इस राजनीतिक घमासान में नाटकीय मोड़ तब आया जब जदयू ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया। इसको लेकर जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव पवन वर्मा ने 21 जनवरी 2020 को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कुमार को पत्र लिखा, जिसमें कहा गया, ‘‘एक तरफ जहां नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर पूरे देश में विरोध हो रहे हैं, ऐसे में जदयू ने कैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया। श्री नीतीश कुमार भाजपा तथा सीएए, एनआरसी एवं एनपीआर पर अपना स्टैंड स्पष्ट करें।’

जदयू महासचवि ने कहा था, ‘‘यदि यह सब आपके निजी विचार हैं तो मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि जब भाजपा के पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने दिल्ली में गठबंधन करने से इनकार कर दिया तो फिर जदयू ने कैसे बिहार से बाहर भाजपा से गठबंधन करने का निर्णय लिया है। वह भी ऐसे समय में जब भाजपा सीएए, एनआरसी और एनपीआर के माध्यम से देश पर विभाजनकारी एजेंडा थोपकर समाज में शांति, सौहार्द और स्थिरता को नष्ट करना चाहती है।’’ इस पर श्री नीतीश कुमार ने कहा, ‘‘श्री वर्मा विद्वान व्यक्ति हैं, मैं उनकी इज्जत करता हूं, भले ही वह हमलोगों की इज्जत न करें। यह उनका अपना निर्णय है, जहां जाना हो वह जाएं, हमको इस पर कोई ऐतराज नहीं है।’’ इसके बाद मुख्यमंत्री श्री कुमार ने कल यहां अपने सरकारी आवास पर बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी को लेकर जदयू नेताओं के साथ हुई बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान सीएए और एनआरसी को लेकर लगातार निशाना साध रहे श्री किशोर के संबंध में पूछे जाने पर कहा, किसी को हम थोड़े ही पार्टी में लाए थे। अमित शाह के कहने पर मैंने प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल कराया था। अमित शाह ने मुझे कहा था कि प्रशांत को पार्टी में शामिल कर लीजिए। अब अगर उन्हें जदयू के साथ रहना है, तो पार्टी की नीति और सिद्धांतों के मुताबिक ही चलना पड़ेगा। सूरज उपाध्याय

मुख्यमंत्री ने कहा, मुझे पता चला है कि पीके आम आदमी पार्टी के लिए रणनीति बना रहे हैं। ऐसे में अब उन्हीं से पूछना चाहिए कि वे जदयू में रहना चाहते हैं या नहीं । हमारी पार्टी बड़े लोगों की पार्टी नहीं है, जहां किसी भी मुद्दे पर ट््वीट और ईमेल कर दिया। अपनी राय रखने के लिए सभी आजाद हैं । एक (पवन वर्मा) पत्र लिखते हैं, तो दूसरे (प्रशांत किशोर) ट््वीट करते हैं। जब तक उन्हें पार्टी में रहने की इच्छा होगी, वे रहेंगे। हम सभी को इज्जत देते हैं।’ इस बीच श्री कुमार के बयान पर जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने दिल्ली में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘नीतीश जी बोल चुके हैं, अब मेरे जवाब का इंतजार कीजिए। मैं उन्हें जवाब देने के लिए बिहार जाऊंगा।’ हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कब बिहार जाने वाले हैं। इतना ही नहीं, श्री किशोर ने कल ही ट््वीट भी किया, ‘‘मुझे आपने (नीतीश) जदयू में क्यों और कैसे शामिल कराया, इस पर इतना गिर कर झूठ बोल रहे हैं। मुझे अपने रंग में रंगने की आपकी यह बेहद खराब कोशिश है। इस संबंध में यदि आप सच बोल रहे हैं तो कौन विश्वास करेगा आपमें अभी तक श्री अमित शाह की सिफारिश पर आए व्यक्ति को नहीं सुनने का साहस अभी तक बचा हुआ है।’’ अंतत: जदयू ने इन दोनों नेताओं श्री किशोर एवं श्री वर्मा को पार्टी से निष्कासित कर करीब डेढ़ महीने से चले आ रहे इस राजनीतिक हलचल का पटाक्षेप कर दिया।