मप्र के 27 जिलों में एक लाख से अधिक बच्चे सिकल सेल एनीमिया के शिकार

मप्र के 27 जिलों में एक लाख से अधिक बच्चे सिकल सेल एनीमिया के शिकार

भोपाल अनूपपुर जिले का रामनारायण आदिवासी (परिवर्तित नाम) 9वीं का छात्र है। उसे तीन साल से सिकल सेल ऐनेमिया है। पहचान होने के बाद उसका इलाज शुरू हुआ और अब सामान्य जीवन जी रहा है। यह कहानी अकेले रामनारायण की नहीं है। मप्र के करीब एक लाख बच्चे सिकल सेल ऐनेमिया जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। इससे निपटने के लिए पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर अनूपपुर, डिंडौरी, मंडला, शहडोल, उमरिया व सीधी में एनएचएम ने सिकल सेल एनीमिया कंट्रोल मिशन शुरू किया है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च जबलपुर की वर्ष 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व के 50 फीसदी सिकल सेल रोगी भारत में हैं। देश के 19 और मप्र के 27 जिलों में इसका असर है। यह आनुवांशिक बीमारी है। इसका बड़ा कारण दो सिकल वाहकों की आपस में शादी या एक सिकल वाहक की एक सिकल रोगी से शादी है।

सिर्फ आदिवासियों में ही बीमारी होती है, यह भ्रम है

इस बीमारी को लेकर भ्रम है कि यह सिर्फ आदिवासियों में ही होती है। लेकिन ऐसा नहीं है। मध्यप्रदेश में पहचाने गए कुल रोगियों में से सिर्फ 30 प्रतिशत ही आदिवासी निकले हैं।

मप्र में सिकल प्रभावित जिले

झाबुआ, बड़वानी, डिंडोरी, अनूपपुर, मंडला, धार, शहडोल, उमरिया, बैतूल, सिवनी, खंडवा, छिंदवाड़ा, हरदा, खरगौन, जबलपुर, रतलाम, देवास, कटनी, दमोह, होशंगाबाद, सागर, सतना, बालाघाट, उज्जैन, इंदौर, मंदसौर, नीमच और नरसिंहपुर जिला सिकल सेल एनीमिया प्रभावित जिले हैं। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च जबलपुर के अनुसार इन जिलों में 100 में से 1 आदमी इस बीमारी से जूझ रहा है। वही 10 में से 1 सिकल जीन लेकर पैदा होता है, लेकिन ये सभी रोगी नहीं होते हैं, इनमें से 90% वाहक होते हैं। इनको कोई लक्षण नहीं होता है। सिर्फ़ 10% ही रोगी होते हैं।

मृत्यु दर की स्थिति

1. बिना इलाज वाले 70प्रतिशत रोगियों की मौत 18 साल से पहले ही हो जाती है।

2. बिना इलाज वाले 20% रोगियों की 30 वर्ष तक की उम्र में मौत।

3. बिना इलाज वाले 10% रोगी ही 30 साल से ऊपर जी पाते हैं। समय पर इलाज मिले तो 70 - 80 साल जी सकते हैं।