‘पैडमैन’ फिल्म के सालों पहले से जागरूक कर रहीं ‘पैड वुमन’ शालिनी

‘पैडमैन’ फिल्म के सालों पहले से जागरूक कर रहीं ‘पैड वुमन’ शालिनी

भोपाल ।  महिलाओं के पीरियड्स को लेकर परिवार, समाज में तरह -तरह के मिथ बने हुए है, आज भी घर परिवार में इस विषय पर चर्चा करने में शर्म, संकोच और झिझक होती है। इस गंभीर और अछूते विषय पर जब पहली बार फिल्म पैड मैन बनाई गई तो हमारी सोच में कुछ बदलाव तो आया, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भोपाल कि रहने वाली डॉक्टर शालिनी सक्सेना पिछले 18 साल से दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों में लगातार समाज की सोच बदल रही हैं और महिलाओं को जागरूक कर रही है कि वे पैड का इस्तेमाल करे साथ ही वे उन्हें ट्रेनिंग भी देती हैं। सेनिटरी नेपकिन बनाने की जिससे ढेरों महिलाएं आज अपने पैरों पर खड़ी हैं, यही वजह है कि अब इन इलाकों में वे पहचानी जाती हैं ‘पैड वुमन’ के नाम से।

आसान नहीं था लंबा सफर

सफर आसान नहीं था लम्बे संघर्ष की कहानी है इस पैड वूमेन की, अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने बीड़ा उठाया समाज की सोच बदलने का जिसकी आलोचना भी हुई। शालिनी बताती हैं कि प्रौढ़ शिक्षा विभाग में लंबे समय तक काम करते हुए वे ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करती थी, इस दौरान उन्होंने महिलाओं की इस समस्या को करीब से देखा जाना और समझा और तभी ठान लिया कि वे इसी क्षेत्र में कुछ करेंगी। इतना कठिन निर्णय लेने के बाद कई बार उन्हें आर्थिक तंगी से भी गुजरना पड़ा। इंदौर, भोपाल आने जाने के लिए वो अपने दोपहिया वाहन का ही उपयोग करती थी। उन्होंने भोपाल गैस पीड़ित महिलाओं को प्रशिक्षण देकर इसकी शुरुआत की। दिल्ली की संस्था मार्क के सहयोग से शालिनी के इस सफर में सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं ने भी साथ दिया।

भोपाल से शुरू हुआ सफर अरुणाचल तक पहुंचा

भोपाल गैस पीड़ित महिलाओं के साथ शुरू हुआ यह सफर आज मप्र के आदिवासी इलाकों के साथ छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, राजस्थान के पिछड़े इलाकों के अलावा अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक पहुंच गया है। मातृ सत्तात्मक समाज अरुणाचल में जागरूकता कार्यक्रम सकरात्मक रहा। डॉक्टर शालिनी की संस्था ने सेंधवा में तीन एकड़ जमीन लेकर एक सेंटर शुरू किया है, जहां महिलाओं को विंग्स वाले सेनिटरी नेपकिन के साथ सिलाई कढ़ाई बुनाई का प्रशिक्षण भी निशुल्क दिया जाता। डॉक्टर शालिनी कहती हैं कि सफर अभी थमा नहीं है। समाज की सोच, महिलाओं की सोच पूरी तरह बदली नहीं है। आगे यह सफर चलता रहेगा, लगातार, अनवरत और हर उस महिला तक पहुंचेंगे, जो आज भी पीरियड्स को बीमारी मानती और समझती है।