नए चेहरों से सजा शिवराज मंत्रिमंडल

नए चेहरों से सजा शिवराज मंत्रिमंडल

आखिरकार शिवराज मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। मध्यप्रदेश में किसी भी सरकार का संभवत: यह पहला मंत्रिमंडल है, जिसमें दो तिहाई से अधिक ऐसे नए चेहरे हैं जो पहली बार मंत्री बने हैं। दूसरी बात यह कि मंत्रिमंडल को बनाने में पहली बार जातिगत व क्षेत्रगत प्रतिनिधित्व के परंपरागत मानदंडों को ताक पर रखा गया। मंत्रिमंडल को लेकर भाजपा के अंदर दो विचार चल रहे थे। एक ज्योतिरादित्य सिंधिया को पर्याप्त महत्व दिया जाए, क्योंकि उन्हीं के चलते कांग्रेस की सरकार गिरी और भाजपा बिना चुनाव में गए एक बार फिर सरकार बना सकी और दूसरा लगातार 12-15 साल तक मंत्री रहे भाजपा विधायकों में कुछ को फिर सत्ता सुख का मौका न दिया जाए। नए मंत्रिमंडल में यह दोनों ही बातें आकार लेती हुई दिखी। कांग्रेस सरकार में जहां सिंधिया के 6 मंत्री थे, तो शिवराज केबिनेट में 11 हो गए। वहीं दूसरी ओर राजेन्द्र शुक्ल, गौरीशंकर बिसेन, रामपाल सिंह, पारस जैन, संजय पाठक जैसे पूर्व मंत्रियों को पूर्व मंत्री ही रहने दिया गया। यहां तक कि और पूर्व मंत्री अजय विश्नोई, करण सिंह वर्मा, हरिशंकर खटिक, नागेन्द्र सिंह आदि को भी मौका नहीं दिया गया। दो उप मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात भी उभरी थी जिसके साकार नहीं होने को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की मजबूती के रूप में देखा जाएगा। शिवराज सिंह के नेतृत्व में चौथी बार सरकार बनने पर यह अपेक्षा थी कि 15 साल की निरंतरता में बदलाव आना चाहिए और यह बदलाव नए मंत्रिमंडल में स्पष्ट दिख रहा है। 2018 के चुनाव के बाद सामान्य बहुमत न पाने के बाद भी कांग्रेस की सरकार बनने व 15 माह तक सरकार चलने के बाद यह आश्वस्ति उभर आई थी कि अब यह सरकार गिरने वाली नहीं है, लेकिन जिस बिजली की गति से कांग्रेस सरकार गिरी उसने सबको चौंका दिया था। एक और चौंकाने वाली बात थी शिवराज सिंह का चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में वापसी करना जिन्हें राजनीति के हाशिये में चले जाने का परसेप्शन बनाने की पुरजोर कोशिश की गई। मंत्रिमंडल का यह विस्तार उसी कड़ी को चांैकाने वाली घटना मानी जा सकती है, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह फिर एक बार ताकतवर बनकर उभरे हैं। रामपाल सिंह, संजय पाठक, आदि को अपने मंत्रिमंडल में पुन: शामिल नहीं कर पाने को उनकी कमजोरी मानने वालों को यह समझना चाहिए कि उन्होंने पार्टी की इस सोच को आगे बढ़ाया है कि निरंतरता की नीरसता में बदलाव की जरूरत है। मंत्रिमंडल के गठन में हर मुख्यमंत्री को पार्टी संगठन या हाइकमान से जद्दोजहद करना पड़ता है, लेकिन जिस खूबसूरती से शिवराज सिंह ने इस जद्दोजहद की तार्किक परिणिति पेश की है, वह स्वयं उन्हें व पार्टी को मजबूती प्रदान करेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कांग्रेस से भाजपा में आने वाले पूर्व विधायकों को सत्ता में जो भागीदारी दी गई है उस पर तात्कालिक रूप से उंगलियां उठाई जा सकती है, लेकिन यह भाजपा नेतृत्व की राजनीतिक ईमानदारी को भी प्रदर्शित करती है कि भाजपा को स्वीकार करने वालों को वायदानुसार पूरा सम्मान और हक दिया जाएगा। मध्यप्रदेश का यह उदाहरण अन्य प्रदेशों में भाजपा को लाभ दिला सकता है जहां उसकी सरकारें नहीं हैं। मंत्रिमंडल में 14 स्थान दूसरे दल से आए विधायकों को देने से भाजपा विधायकों को नुकसान हुआ, यह भी नहीं माना जा सकता। 165 विधायकों में 35 मंत्री पाने वाली पार्टी को 107 विधायकों के साथ 20-22 मंत्री ही मिल सकते थे, जो उन्हें मिल गए हैं।